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जानें, कहां से पैदा हुआ है राजीव शर्मा को डीजीपी बनाने के पीछे का उदेश्य…

राजस्थान के नए पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) राजीव शर्मा होंगे. भजनलाल गवर्नमेंट ने उनके नाम पर मुहर लगाते हुए आदेश जारी कर दिए.

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यूपीएससी के पैनल ने राज्य गवर्नमेंट को तीन आईपीएस राजीव शर्मा, राजेश निर्वाण और संजय अग्रवाल के नाम शॉर्टलिस्ट कर भेजे थे. डीजीपी की दौड़ में 1990 बैच के आईपीएस राजीव शर्मा का नाम सबसे आगे चल रहा था. केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर गए राजीव शर्मा को बुलाने के लिए गवर्नमेंट ने पत्र लिखा था.

आईपीएस राजीव शर्मा कैसे गवर्नमेंट की पहली पसंद बने और राजेश निर्वाण और संजय अग्रवाल क्यों पिछड़ गए. इसे भास्कर ने एक्सपर्ट से समझने की प्रयास की. एक्सपर्ट की मानें तो गवर्नमेंट ने निष्ठा और योग्यता काे ध्यान में रखते हुए डीजीपी का चयन किया.

राजीव शर्मा के डीजीपी बनने के पीछे 4 कारण

  • राजीव शर्मा 1990 बैच के आईपीएस अधिकारी होने के कारण सबसे सीनियर हैं. वे राजस्थान के डीजीपी नियुक्त होने से पहले केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो (बीपीआरडी) में डीजी के पद पर कार्यरत थे. राजीव शर्मा ने दिल्ली CBI के साथ राजस्थान में भी कई जरूरी पदों की जिम्मेदारी संभाली है. वे प्रदेश के कई जिलों में एसपी रहने के साथ ही डीजी एसीबी, डीजी लॉ एंड ऑर्डर और आरपीए (राजस्थान पुलिस एकेडमी) डायरेक्टर की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं. आरपीए में पुलिस अफसरों को ट्रेनिंग दी जाती है.
  • डीजीपी पद पर उनके चयन के प्रमुख कारणों में उनकी वरिष्ठता और सेवा अनुभव रहा. गवर्नमेंट ने भी डीजीपी पद के लिए सबसे वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी का चयन किया है. इस कारण पुलिस विभाग में भी इसे सकारात्मक रूप से देखा जा रहा है. वरिष्ठ अधिकारी को जिम्मेदारी सौंपने से ऑफिसरों में विश्वास बढ़ता है और इससे प्रशासनिक संतुलन भी बनता है.
  • आईपीएस राजीव शर्मा की छवि निष्ठावान और अनुशासनप्रिय अधिकारी की रही हैं. डीजी एसीबी (वर्ष से तक) रहने के दौरान उनकी पारदर्शी कार्यशैली देखी गई. वे समय के पाबंद माने जाते हैं.
  • वरिष्ठ पत्रकार नारायण बाहरठ का बोलना है कि वे सीएम भजनलाल शर्मा की निष्ठा और योग्यता दोनों पैमानों पर खरे उतरे हैं. राजस्थान और दिल्ली में उनके कार्य अनुभव को देखते हुए उन्हें यह जिम्मेदारी दी गई है.

सरकार ने तीन नामों में से शर्मा को चुना

कार्मिक विभाग ने 7 आईपीएस के नाम यूपीएससी को भेजे थे. आईपीएस राजेश आर्य के इनकार करने के बाद नए डीजीपी के चयन के लिए दिल्ली में 27 जून को बैठक हुई. जिसमें छह नामों पर चर्चा हुई.

आयोग ने नियमानुसार डीजीपी के लिए तीन नामों पर सहमति जताई. आयोग ने राजीव शर्मा, राजेश निर्वाण और संजय अग्रवाल के नाम शॉर्टलिस्ट कर राज्य गवर्नमेंट को भेजे. इनके चयन में वरिष्ठता, सेवा रिकॉर्ड और केंद्र और राज्य स्तर पर अनुभव को ध्यान में रखा गया.

राजस्थान में नए डीजीपी के चयन में हो रही देरी के कारण पैनल में गए नामाें को लेकर चर्चाओं का दौर चल रहा था. इन नामों में से गवर्नमेंट ने राजीव शर्मा के नाम पर सहमति दी. कार्मिक विभाग ने उन्हें रिलीव करने के लिए केंद्र को पत्र लिखा. केंद्र की स्वीकृति के बाद आखिरकार गुरुवार को उन्हें डीजीपी बनाने के आदेश जारी कर दिए.

क्यों पिछड़े राजेश निर्वाण और संजय अग्रवाल

सुप्रीम न्यायालय के आदेश और नियमानुसार वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी को ही डीजीपी बनाने की परंपरा रही है. लेकिन कई बार यह परंपरा टूटी भी है. कई बार सीनियर पुलिस अधिकारी को दरकिनार कर जूनियर अधिकारी को डीजीपी बनाया जाता रहा है. राजस्थान में भी ऐसा कई बार हुआ है.

वरिष्ठ पत्रकार नारायण बाहरठ का बोलना है कि भाजपा शासित राज्यों में यह अधिक देखा गया है. राजस्थान में पूर्व सरकारों ने वरिष्ठता को लांघकर अपनी पसंद के डीजीपी नियुक्त किए हैं. हालांकि उत्तर प्रदेश की तुलना में राजस्थान में बड़े स्तर पर वरिष्ठ ऑफिसरों को दरकिनार कर डीजीपी की नियुक्ति नहीं हुई है.

यही कारण है कि पैनल में शामिल 1992 बैच के आईपीएस संजय अग्रवाल और राजेश निर्वाण डीजीपी बनने की दौड़ में शामिल थे. गवर्नमेंट को भेजे गए यूपीएससी के पैनल में भी उनका नाम शामिल था. संजय अग्रवाल अभी डीजी इंटेलिजेंस के पद पर कार्यरत हैं. वहीं राजेश निर्वाण केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली में तैनात हैं. दोनों ने राजस्थान और केंद्र में कई जरूरी पदों की जिम्मेदारी संभाली है. इसके बावजूद वरिष्ठता के पैमाने और गवर्नमेंट की पसंद के मुद्दे में दोनों अधिकारी पिछड़ गए.

क्या अगले डीजीपी बन सकते हैं राजेश आर्य और संजय अग्रवाल?

नवनियुक्त डीजीपी राजीव शर्मा का कार्यकाल 2 वर्ष का होगा. वे 30 जून 2026 को रिटायर होने होंगे. इसके बाद आईपीएस संजय अग्रवाल और राजेश निर्वाण में से कोई नया डीजीपी बन सकता है. वरिष्ठता के आधार पर यूपीएससी के पैनल में इनके अतिरिक्त 1993 बैच के आईपीएस गोविंद गुप्ता का नाम शामिल हो सकता है.

राजेश निर्वाण तीन वर्ष पांच महीने और संजय अग्रवाल तीन वर्ष छह महीने बाद रिटायर हाेंगे. ऐसे में गवर्नमेंट बीच में कोई उलटफेर नहीं करती है तो इनमें से कोई एक अधिकारी को डीजीपी बनाए जाने पर विचार कर सकती है. आईपीएस अधिकारी गाेविंद गुप्ता और राजेश आर्य करीब ढाई वर्ष बाद रिटायर होंगे. वहीं 1994 बैच के आईपीएस अधिकारी आनंद कुमार श्रीवास्तव के रिटायरमेंट में दो वर्ष बाकी हैं.

गहलोत और वसुंधरा गवर्नमेंट से अलग निर्णय

वर्तमान गवर्नमेंट डीजीपी चयन को लेकर पूर्ववर्ती सरकारों की परिपाटी से अलग दिखाई दी. पूर्व सीएम अशोक गहलाेत और वसुंधरा राजे ने अपने कार्यकाल के दौरान वरिष्ठता लांघकर अपनी पसंद के आईपीएस को डीजीपी बनाया. जबकि वर्तमान गवर्नमेंट ने वरिष्ठता का सम्मान करते हुए वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी को यह जिम्मेदारी सौंपी.

राजनीतिक विश्लेषक वरुण पुरोहित का बोलना है कि मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक जैसे पदों पर आईएएस और आईपीएस के चयन में वरिष्ठता, सेवा कार्य और अनुभव देखा जाता है. लेकिन आखिरी फैसला राज्य सरकारें ही लेती हैं.

राज्य गवर्नमेंट सियासी दलों की होती हैं और किसी भी पार्टी की गवर्नमेंट अपने सियासी दृष्टिकोण से ही फैसला लेती है. इस कारण ब्यूरोक्रेसी और सियासी दलों का एक गठजोड़ बन गया है. इसके कारण आमजनता की सुनवाई नहीं होती और पूर्ण रूप से जनहित में कार्य नहीं होते हैं.

केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से अति उत्कृष्ट सेवा पदक ग्रहण करते हुए नवनियुक्त डीजीपी राजीव शर्मा.

कार्यवाहक डीजीपी और अतिरिक्त प्रभार की परंपरा ठीक नहीं

वरिष्ठ पत्रकार नारायण बाहरठ डीजीपी चयन में वरिष्ठता लांघकर पसंद के अधिकारी की नियुक्ति करने और कार्यवाहक डीजीपी बनाने की परंपरा को ठीक नहीं मानते हैं. उनका बोलना है कि पिछले 19 वर्ष से ये मामला चल रहा है. हरियाणा, राजस्थान, झारखंड में एडहॉक डीजीपी बनाया गया. पंजाब में आप पार्टी ने भी एडहॉक डीजीपी बनाया.

उत्तरप्रदेश में वरिष्ठ आईपीएस को दरकिनार कर 18वें नंबर के आईपीएस को डीजीपी नियुक्त किया. कई राज्य अस्थाई डीजीपी नियुक्त करने का एक नया रिवाज कायम कर रहे हैं. यह ठीक नहीं है. सरकारें जब उच्चतम न्यायालय के निर्देश की पालना नहीं करेगी तो ये समाज में अच्छी नजीर नहीं बनेगी. जहां तक तत्कालीन प्रबंध की बात है. यह हमारी संसद या सियासी दलों की मेहरबानी नहीं है. ये प्रबंध उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप से लागू हुई है.

जल्द बदलेंगे जिलों के एसपी से डीजी तक

पुलिस विभाग में डीजीपी की नियुक्ति के बाद कई जिलों में एसपी से डीजी लेवल तक अफसरों के तबादले होना तय बताया जा रहा है. एसीबी डीजी डाक्टर रविप्रकाश मेहरड़ा सोमवार को रिटायर हो गए. ऐसे में डीजी एसीबी का पद रिक्त हो गया है. एडीजी से डीजी के पद पर पदोन्नत होने के बाद आनंद श्रीवास्तव, अशोक राठौड़ और मालिनी अग्रवाल को भी नयी पोस्टिंग नहीं दी गई है.

इसके अतिरिक्त डीआईजी पद पर प्रमोट किए गए 10 आईपीएस अधिकारी अब भी अपने पुराने कार्यस्थलों पर पदस्थ हैं. तीन आईपीएस अधिकारी डीआईजी से आईजी पद पर पदोन्नत हुए हैं, लेकिन अब भी डीआईजी के तौर पर काम कर रहे हैं. झुंझुनूं जिला एसपी का पद भी रिक्त चल रहा है. ऐसे में आनें वाले स्थानांतरण सूची में प्रदेश में कई आईपीएस ऑफिसरों का बदलना तय बताया जा रहा है.

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