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Manmohan Singh: नोटबंदी पर यह राय रखते थे मनमोहन सिंह

Manmohan Singh: हिंदुस्तान के आर्थिक सुधारों के वास्तुकार के रूप में प्रशंसित पूर्व पीएम मनमोहन सिंह ने 2019 में अपने आखिरी इंटरव्यू में से एक में राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को ‘‘अत्यधिक विनियमित” करार देते हुए बोला था कि गवर्नमेंट इसे नियंत्रित करती है, हस्तक्षेप बहुत अधिक बढ़ गया है और यहां तक ​​कि नियामक भी ‘‘नियंत्रक में बदल गए हैं”.

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अपने उत्तराधिकारी नरेंद्र मोदी के लगातार दूसरे कार्यकाल के लिए पीएम के रूप में पदभार संभालने से कुछ दिन पहले पांच मई, 2019 को ‘पीटीआई-भाषा’ को दिए एक विशेष इंटरव्यू में सिंह ने आसन्न मंदी का संकेत देने के लिए तत्कालीन आर्थिक विकास के आंकड़ों का हवाला दिया था.

उन्होंने आर्थिक नीतियों में अदालतों के ‘‘बढ़ते हस्तक्षेप” पर भी निराशा जाहिर की और बोला कि कांग्रेस पार्टी अर्थव्यवस्था को अलग ढंग से संभालती. सिंह 2004 से 2014 तक दो कार्यकाल के लिए पीएम रहे. उन्हें हिंदुस्तान की आर्थिक सुधार प्रक्रिया का नेतृत्व करने का श्रेय दिया जाता है.

उन्होंने इल्जाम लगाया था कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली गवर्नमेंट में राष्ट्र की अर्थव्यवस्था की गतिशीलता के बारे में दूरदृष्टि या समझ का अभाव है, जिसके कारण नोटबंदी जैसे ‘‘विघटनकारी” निर्णय लिए गए, जिसे उन्होंने पहले ‘‘संगठित लूट और वैधानिक डकैती” करार दिया था.

सिंह ने यह भी बोला था कि लोग मौजूदा गवर्नमेंट की प्रत्येक दिन की बयानबाजी और दिखावटी बदलावों से ‘तंग’ आ चुके हैं. उन्होंने बोला कि इस ‘‘भ्रम और दंभ भरी आत्मप्रशंसा” के विरुद्ध परिवर्तन की लहर उठ रही है. उन्होंने बोला कि वे हमेशा गवर्नमेंट की समीक्षा और ज़िम्मेदारी का स्वागत करते रहे हैं, क्योंकि यह लोकतंत्र का अभिन्न अंग है.

सिंह ने दावा किया था कि इल्जाम लगने पर उन्होंने अपने ही लोगों के विरुद्ध कार्रवाई प्रारम्भ की थी. उन्होंने बोला था कि मोदी के नेतृत्व वाली गवर्नमेंट करप्शन के आरोपों के प्रति असंवेदनशील है, वह स्वयं को इसके लिए जवाबदेह नहीं मानती है. पूर्व पीएम ने दावा किया कि मोदी गवर्नमेंट पारदर्शिता लाने और करप्शन के विरुद्ध लड़ाई के वादे पर सत्ता में आई थी. उन्होंने बोला कि पिछले पांच सालों में ‘‘हमने करप्शन को अकल्पनीय स्तर तक बढ़ते देखा है.

उन्होंने बोला कि नोटबंदी संभवत: स्वतंत्र हिंदुस्तान का सबसे बड़ा घोटाला था. हिंदुस्तान के आर्थिक सुधारों के जनक और राजनीति की कठिन भरी दुनिया में आम सहमति बनाने वाले डाक्टर सिंह का बृहस्पतिवार देर रात दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में मृत्यु हो गया. वह 92 साल के थे.

इस साल हुए लोकसभा चुनाव के दौरान पूर्व पीएम मनमोहन सिंह का स्वास्थ्य ठीक नहीं था लेकिन उन्होंने पीएम नरेन्द्र मोदी की कड़ी आलोचना करते हुए उन पर ‘घृणास्पद भाषण’ देकर सार्वजनिक विमर्श की गरिमा और पीएम पद की गंभीरता को कम करने का इल्जाम लगाया था. यह एक प्रकार से संकेत था कि खराब स्वास्थ्य के बावूजद उनके अंदर का राजनेता पूरे जोश में है.

सिंह ने लोकसभा चुनाव के सातवें चरण के अनुसार एक जून को होने वाले मतदान से पहले पंजाब के मतदाताओं से अपील करते हुए बोला था कि सिर्फ़ कांग्रेस पार्टी ही एक ऐसा विकासोन्मुख प्रगतिशील भविष्य सुनिश्चित कर सकती है, जहां लोकतंत्र और संविधान की रक्षा होगी. वरिष्ठ कांग्रेस पार्टी नेता ने सेना में अल्पकालिक भर्ती की ‘अग्निपथ’ योजना को लागू करने के लिए भी बीजेपी गवर्नमेंट पर निशाना साधा था और इसे उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा कहा था.

पंजाब के मतदाताओं को लिखे इस पत्र में उन्होंने बोला था, “भाजपा सोचती है कि देशभक्ति, शौर्य और सेवा का मूल्य सिर्फ़ चार वर्ष है. यह उनके नकली राष्ट्रवाद का परिचायक है.कांग्रेस पार्टी ने पंजाब में लोकसभा चुनाव से पहले लिखे गए सिंह के इस पत्र को 30 मई को मीडिया को जारी किया था. सिंह ने बोला था कि नियमित भर्ती के लिए प्रशिक्षण लेने वालों को मोदी गवर्नमेंट ने बुरी तरह विश्वासघात दिया है.

उन्होंने कहा, ‘‘सशस्त्र बलों के माध्यम से मातृभूमि की सेवा करने का सपना देखने वाला पंजाब का युवा, किसान का बेटा अब सिर्फ़ चार वर्ष के कार्यकाल के लिए भर्ती होने के बारे में दो बार सोच रहा है. अग्निवीर योजना राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालती है. इसलिए कांग्रेस पार्टी पार्टी ने अग्निवीर योजना को समाप्त करने का वादा किया है.

मोदी पर धावा बोलते हुए सिंह ने बोला था, ‘मैं इस चुनाव अभियान के दौरान सियासी संवाद पर करीबी नजर रख रहा हूं. मोदी जी नफरत फैलाने वाले भाषणों के सबसे शातिर रूप में लिप्त हैं, जो प्रकृति में विशुद्ध रूप से विभाजनकारी हैं. मोदी जी पहले पीएम हैं जिन्होंने सार्वजनिक संवाद की गरिमा को कम किया है और इस तरह उन्होंने पीएम के पद की गंभीरता को कम किया है.

पूर्व पीएम ने बोला था, “अतीत में किसी भी पीएम ने इस तरह के घृणास्पद, असंसदीय और असभ्य शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया है जो कि समाज के किसी खास वर्ग या विपक्ष को निशाना बनाने के मकसद से कहे गए हों. उन्होंने मेरे लिए कुछ गलत बयान भी दिए हैं. मैंने अपने जीवन में कभी भी एक समुदाय को दूसरे से अलग नहीं किया है. यह बीजेपी का एकमात्र कॉपीराइट है. हिंदुस्तान के लोग यह सब देख रहे हैं.

उन्होंने मतदाताओं से हिंदुस्तान में प्यार, शांति, भाईचारे और सद्भाव को एक मौका देने की अपील की थी और पंजाब के मतदाताओं से विकास और समावेशी प्रगति के लिए मतदान करने का आग्रह किया था. उन्होंने बोला था, “मैं सभी युवाओं से अपील करता हूं कि वे सावधानी बरतें और उज्जवल भविष्य के लिए मतदान करें. सिर्फ़ कांग्रेस पार्टी ही विकासोन्मुख प्रगतिशील भविष्य सुनिश्चित कर सकती है, जहां लोकतंत्र और संविधान की रक्षा की जाएगी.

नयी दिल्ली, 27 दिसंबर (भाषा) हिंदुस्तान के आर्थिक सुधारों के जनक मनमोहन सिंह को 1991 के अपने उस ऐतिहासिक केंद्रीय बजट की व्यापक स्वीकृति सुनिश्चित करने के लिए अग्नि परीक्षा का सामना करना पड़ा था, जिसने राष्ट्र को अपने सबसे खराब वित्तीय संकट से उबारा था. पीवी नरसिंह राव नीत गवर्नमेंट में नवनियुक्त वित्त मंत्री सिंह ने यह काम बहुत बेबाकी से किया.

बजट के बाद संवाददाता सम्मेलन में पत्रकारों का सामना करने से लेकर संसदीय दल की बैठक में व्यापक सुधारों को पचा न पाने वाले नाराज कांग्रेस पार्टी नेताओं तक…सिंह अपने फैसलों पर अडिग रहे. सिंह के ऐतिहासिक सुधारों ने न सिर्फ़ हिंदुस्तान को दिवालियापन से बचाया, बल्कि एक उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में इसकी दिशा को भी पुनर्परिभाषित किया.

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने अपनी पुस्तक ‘टू द ब्रिंक एंड बैक: इंडियाज 1991 स्टोरी’ में लिखा, ‘‘ केन्द्रीय बजट प्रस्तुत होने के एक दिन बाद 25 जुलाई 1991 को सिंह बिना किसी पूर्व योजना के एक संवाददाता सम्मेलन में मौजूद हुए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उनके बजट का संदेश ऑफिसरों की उदासीनता के कारण विकृत न हो जाए.

इस पुस्तक में जून 1991 में राव के पीएम बनने के बाद तेजी से आए बदलावों का जिक्र है. रमेश ने 2015 में प्रकाशित इस पुस्तक में लिखा, ‘‘ वित्त मंत्री ने अपने बजट की व्याख्या की और इसे ‘‘मानवीय बजट” करार दिया. उन्होंने उर्वरक, पेट्रोल और एलपीजी की कीमतों में वृद्धि के प्रस्तावों का बड़ी दृढ़ता से बचाव किया.

राव के कार्यकाल के शुरुआती महीनों में रमेश उनके सहयोगी थे. कांग्रेस पार्टी में असंतोष को देखते हुए राव ने एक अगस्त 1991 को कांग्रेस पार्टी संसदीय दल (सीपीपी) की बैठक बुलाई और पार्टी सांसदों को ‘‘ खुलकर अपनी बात रखने” का मौका देने का निर्णय किया. रमेश ने लिखा, ‘‘ पीएम ने बैठक से दूरी बनाए रखी और मनमोहन सिंह को उनकी आलोचना का स्वयं ही सामना करने दिया.” उन्होंने बोला कि दो-तीन अगस्त को दो और बैठकें हुईं, जिनमें राव पूरे समय उपस्थित रहे.

रमेश ने लिखा, ‘‘ सीपीपी की बैठकों में वित्त मंत्री अकेले नजर आए और पीएम ने उनका बचाव करने या उनकी कठिनाई दूर करने के लिए कुछ नहीं किया.सिर्फ़ दो सांसदों मणिशंकर अय्यर और नाथूराम मिर्धा ने सिंह के बजट का पूरी तरह समर्थन किया. अय्यर ने बजट का समर्थन करते हुए तर्क दिया था कि यह बजट राजीव गांधी की इस धारणा के अनुरूप है कि वित्तीय संकट को टालने के लिए क्या किया जाना चाहिए.

पार्टी के दबाव के आगे झुकते हुए सिंह ने उर्वरक की कीमतों में 40 फीसदी की वृद्धि को घटाकर 30 फीसदी करने पर सहमति व्यक्त की थी, लेकिन एलपीजी तथा पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि को यथावत रखा था. सियासी मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति की चार-पांच अगस्त 1991 को दो बार बैठक हुई, जिसमें यह फैसला लिया गया कि छह अगस्त को सिंह लोकसभा में क्या वक्तव्य देंगे.

पुस्तक के मुताबिक, ‘‘ इस बयान में इस वृद्धि को वापस लेने की बात नहीं मानी गई जिसकी मांग पिछले कुछ दिनों से की जा रही थी बल्कि इसमें छोटे तथा सीमांत किसानों के हितों की रक्षा की बात की गई.” रमेश ने लिखा, ‘‘ दोनों पक्षों की जीत हुई.

पार्टी ने पुनर्विचार के लिए विवश किया, लेकिन गवर्नमेंट जो चाहती थी उसके मूल सिद्धांतों… यूरिया के अतिरिक्त अन्य उर्वरकों की कीमतों को नियंत्रण मुक्त करना तथा यूरिया की कीमतों में वृद्धि को बरकरार रखा गया.” उन्होंने पुस्तक में लिखा, ‘‘ यह सियासी अर्थव्यवस्था का सर्वोत्तम रचनात्मक उदाहरण है. यह इस बात की मिसाल है कि किस प्रकार गवर्नमेंट तथा पार्टी मिलकर दोनों के लिए बेहतर स्थिति बना सकते हैं.

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