मायावती ने यूं ही गठबंधन में न जाने का न किया फैसला

मायावती ने तीन दिन पहले यूपी की राजधानी लखनऊ में आयोजित पार्टी के कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के साथ जब किसी भी सियासी दल के साथ गठबंधन न करने की बात कही तो यह बात सियासी पार्टियों समेत राजनीतिक जानकारों के गले नहीं उतरी। सियासी विश्लेषक देवप्रताप सूर्य कहते हैं कि मायावती ने यह बयान पहली बार नहीं दिया है। इससे पहले भी वह लगातार किसी भी राजनीतिक दल के साथ गठबंधन में न जाने की बात करती रही है। उनका बोलना है कि ऐसा करके मायावती न केवल अपने कार्यकर्ताओं और मतदाताओं को संदेश दे रही है बल्कि आने वाले चार विधानसभा चुनावों में अपनी पार्टी की हैसियत का भी आकलन करने का पूरा रोड मैप तैयार कर रही हैं। सियासी जानकारों का बोलना है कि मायावती इन विधानसभा के चुनावों में मिलने वाले अपने वोट के आधार पर अगली राजनीति की राह बनाने की पुख्ता योजना बना चुकी हैं।
सियासी जानकार बताते हैं कि मायावती ने यूं ही गठबंधन में न जाने का निर्णय नहीं किया है। जानकारों का मानना है कि बीएसपी की इस समय जो राजनीतिक हैसियत है वह अन्य क्षेत्रीय दलों की तुलना में उतनी मजबूत नहीं है। इसीलिए बसपा की बड़ी रणनीति यही है कि अगले कुछ महीनो में होने वाले चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में मिलने वाली सीटों और मत फीसदी को बड़ा आधार बनाया जाए। राजनीतिक जानकारी का बोलना है कि ऐसा करके मायावती के पास किसी भी बड़े राजनीतिक गठबंधन में शामिल होने के लिए मजबूत बैकग्राउंड तैयार हो सकेगा। सियासी विश्लेषक बलवीर सिंह कहते हैं कि यूपी में बसपा का महज एक विधायक है। जबकि एक दौर में मायावती की यूपी में पूर्ण बहुमत की गवर्नमेंट हुआ करती थी। बलवीर सिंह कहते हैं कि ऐसी दशाओं में मायावती के पास बड़े राजनीतिक गठबंधन के सामने अपनी शर्तों के आधार पर किसी भी तरह के समझौते की आशा कम नजर आ रही है। यदि मायावती के पास इन चार राज्यों में मजबूत जनाधार तैयार होता है तो संभव है कि बसपा अपने वोट बैंक और चार राज्यों में मिलने वाले जनाआधार पर अपनी शर्तों के साथ प्रमुखता से बात कर सके।
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