RSS के 100 साल पुरे होने पर मोहन भागवत ने दी एकता की बड़ी सीख
100 Years of RSS: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। इस अवसर पर नयी दिल्ली के विज्ञान भवन में अगस्त के आखिरी हफ्ते में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत की एक व्याख्यानमाला आयोजित की गई। यह व्याख्यानमाला सिर्फ़ एक औपचारिक आयोजन भर नहीं थी। यह कई मामलों में संघ की सोच को उजागर करने वाली थी। कई मिथ और भ्रम को तोड़ने वाली थी। तीन दिनों तक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने जिस स्वर में राष्ट्र, समाज और भविष्य की दिशा पर विचार रखे, उनमें सबसे अधिक चर्चा हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर उनकी टिप्पणी ने बटोरी।

दशकों से यह धारणा मजबूत रही है कि संघ मुसलमानों को स्वीकार नहीं करता, बल्कि उन्हें शक और दूरी की दृष्टि से देखता है। लेकिन विज्ञान भवन से उठी आवाज ने इस मिथक को चुनौती दी और एक नए संवाद की आसार जगाई। मोहन भागवत ने साफ शब्दों में बोला – “भारत के मुस्लिम किसी और राष्ट्र से नहीं आए। वे इसी भूमि के वंशज हैं। हिंदू और मुस्लिम के पूर्वज अलग नहीं हैं। सब हिंदुस्तान माता की संतान हैं।” यह कथन सिर्फ़ किसी समुदाय को दिलासा देने वाला बयान नहीं था। यह उस वैचारिक दीवार को तोड़ने का कोशिश था, जिसे संघ के आलोचक सालों से मजबूत करते आए हैं।
भारतीय राजनीति और सामाजिक विमर्श में संघ को अक्सर मुसलमान-विरोधी संगठन के रूप में प्रस्तुत किया गया। विभाजन की त्रासदी, पाक का निर्माण और समय-समय पर पनपती अलगाववादी प्रवृत्तियां इस धारणा को और गाढ़ा करती रहीं। लेकिन संघ के चिंतन की जड़ें इससे कहीं गहरी हैं। संघ का बोलना हमेशा रहा है कि राष्ट्रीयता का आधार धर्म नहीं, संस्कृति और मातृभूमि है। भागवत ने विज्ञान भवन के मंच से इसी विचार को और साफ करते हुए कहा, “हमारी पहचान धर्म से नहीं, मातृभूमि से है। भिन्न-भिन्न मजहबों के रास्ते हो सकते हैं, लेकिन मंज़िल वही हिंदुस्तान है और हिंदुस्तान को ही सबका साझा घर बनाना है।”
यह वक्तव्य सुनते ही यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि यह विचार संघ के भीतर प्रारम्भ से था, तो फिर समाज में संघ की छवि इतनी उल्टा कैसे बनी? इसका उत्तर शायद राजनीति की उस प्रवृत्ति में छिपा है, जहां हिंदू-मुस्लिम विभाजन को सत्ता प्राप्ति का आसान हथियार मान लिया गया। संघ को सख्त और मुसलमानों से दूरी बनाए रखने वाला संगठन बताना सियासी विमर्श का हिस्सा बना और धीरे-धीरे यही छवि आम नागरिकों की सोच में बैठ गई। यही वजह है कि भागवत ने अपने वक्तव्यों में “साझा पूर्वज” की धारणा पर विशेष बल दिया. उन्होंने कहा, “हमारे खून में कोई फर्क नहीं है। जिनके पूर्वज राम थे, वही पूर्वज रहीम भी हैं। नाम बदल गए, मजहब बदल गए, पर मिट्टी तो वही है और मिट्टी से बड़ा कोई रिश्ता नहीं होता।”
यह कथन सिर्फ़ इतिहास का स्मरण नहीं है। यह एक मनोवैज्ञानिक सूत्र भी है, जो हिंदू मुस्लिम के विभाजन की खाई को पाटने में सहायता कर सकता है। जब दो समुदाय स्वयं को एक ही पूर्वजों का वंशज मानने लगें, तो संवाद की आरंभ कहीं अधिक सहज हो जाती है। यह विचार हिंदू समाज को भी उतना ही संबोधित करता है जितना मुसलमानों को। संघ पिछले कुछ सालों से मुसलमानों के बीच जाकर उनसे संवाद का कोशिश कर रहा है। संघ प्रमुख मोहन भागवत लगातार मुसलमान धर्म गुरुओं और विद्वानों से मिल रहे हैं। संघ का मूल स्वप्न हिंदुस्तान को विश्वगुरु बनाना है। लेकिन इस बार भागवत ने पहली बार यह स्वीकारोक्ति सार्वजनिक रूप से की कि यह सपना हिंदू और मुस्लिम दोनों के मिलकर चलने से ही साकार हो सकता है। उन्होंने कहा, “यदि हम बंटे रहेंगे तो विश्वगुरु का सपना कभी पूरा नहीं होगा। हमें सबको मिलकर आगे बढ़ना होगा।” हिंदुस्तान के पास योग, आयुर्वेद, अध्यात्म, विज्ञान और लोकतांत्रिक परंपराओं की शक्ति है। लेकिन यदि आंतरिक रूप से समाज धार्मिक आधार पर बंटा रहेगा, तो यह शक्ति कभी विश्व नेतृत्व में नहीं बदल पाएगी। इस संदर्भ में संघ का यह संदेश विशेष महत्व रखता है।
यह प्रश्न भी उठता है कि क्या संघ सचमुच बदल रहा है या वही पुराना विचार नयी भाषा में व्यक्त कर रहा है। समर्थक मानते हैं कि यह उसका मूल चिंतन ही है, बस अब संवाद की भाषा में सामने आ रहा है। आलोचक कहते हैं कि समय और परिस्थितियों ने संघ को यह रुख अपनाने पर विवश किया है। लेकिन हकीकत यह है कि संघ का शीर्ष नेतृत्व समझ रहा है कि संवाद और समन्वय के बिना हिंदुस्तान की एकता और अखंडता संभव नहीं. यह परिवर्तन सिर्फ़ संघ के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए जरूरी है।
फिर भी, यह रास्ता आसान नहीं है। पहली चुनौती है विश्वास का संकट. मुसलमान समाज का बड़ा हिस्सा अब भी संघ की नीयत पर शंका करता है। उनके लिए यह मानना मुश्किल है कि जो संगठन दशकों से उनकी आलोचना करता रहा, वही अब संवाद की बात कर रहा है। दूसरी चुनौती है कट्टरपंथ की दीवार। हिंदू और मुस्लिम, दोनों पक्षों के कट्टरपंथी इस संवाद को असफल करने की प्रयास करेंगे। उनकी राजनीति और पहचान ही इस विभाजन पर टिकी है। तीसरी चुनौती है सियासी स्वार्थ। लंबे समय से भारतीय राजनीति हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण पर फलती-फूलती रही है। जिसका लाभ कुछ विशेष सियासी दलों को होता है। ऐसे में इस संवाद को स्थाई बनाना उनके लिए खतरे की घंटी होगी।
प्रश्न यह भी है कि क्या मुसलमान समाज संघ की इस पहल को गंभीरता से लेगा? भागवत के शब्दों को सिर्फ़ ‘राजनीतिक बयान’ मानकर खारिज कर देना आसान होगा, लेकिन यह ऐतिहासिक अवसर भी हो सकता है। मोहन भागवत ने कहा, “किसी को डरने की आवश्यकता नहीं है। आप अपने धर्म का पालन कीजिए, अपनी नमाज़ पढ़िए, अपनी परंपराओं को निभाइए। बस इतना कीजिए कि हिंदुस्तान को अपनी मातृभूमि मानकर उसके भलाई को सर्वोपरि रखिए।” यह वाक्य इस बात का प्रमाण है कि संघ मुसलमानों से उनकी धार्मिक पहचान छोड़ने की मांग नहीं कर रहा। वह सिर्फ़ इतना चाहता है कि सभी समुदाय हिंदुस्तान की राष्ट्रीय एकता और समृद्धि में साझेदार बनें।
विज्ञान भवन के मंच से उठे स्वर हमें यह सोचने पर विवश करते हैं कि क्या यह हिंदुस्तान के इतिहास का नया अध्याय हो सकता है। क्या सचमुच वह समय आ गया है जब हम अतीत की पीड़ाओं और राजनीति की दीवारों से आगे निकलकर एक साझा भविष्य की ओर बढ़ें? इसका उत्तर मोहन भागवत ने दिया, “हम एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। हिंदुस्तान पूर्ण तभी होगा जब हर समुदाय, हर धर्म, हर संस्कृति एक साथ खड़ी होगी।” यह सिर्फ़ संघ का संदेश नहीं, बल्कि हिंदुस्तान की नियति का आह्वान है।
संघ ने अपने शताब्दी साल की आरंभ हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर संवाद की बात करके की है। यदि यह संवाद सिर्फ़ शब्दों तक सीमित न रहकर व्यवहार में उतर जाए तो यह हिंदुस्तान की सबसे गहरी सामाजिक-सामुदायिक खाई को पाट सकता है। संघ की ओर से यह पहल एक ऐतिहासिक आरंभ है। अब देखना यह है कि मुसलमान समाज इसे कैसे स्वीकार करता है और संघ अपने स्वयंसेवकों को किस हद तक इस नयी दिशा में ढाल पाता है।
यह सच है कि हिंदुस्तान का भविष्य तभी सुरक्षित और गौरवशाली होगा, जब यह भूमि अपनी उसी सनातन पहचान को फिर से जगा पाएगी। जहां हर धर्म, हर संस्कृति और हर परंपरा को समान जगह है। यही मार्ग हमें विश्वगुरु की ओर ले जाएगा और शायद यही मोहन भागवत की तीन दिवसीय व्याख्यानमाला का सबसे बड़ा संदेश भी है।

