MP हाईकोर्ट ने दिया बयान, पति की सहमति के बिना पत्नी नहीं करा सकती गर्भपात
पति द्वारा तलाक की याचिका पर सुनवाई करते हुए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने बड़ी टिप्पणी की है। न्यायालय ने बोला कि पति की सहमति के बिना पत्नी द्वारा गर्भपात कराना क्रूरता है। न्यायालय ने कहा, ‘हिंदू शादी अधिनियम, 1955 की धारा 13 के अनुसार यह क्रूरता है।’ न्यायमूर्ति विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति बिनोद कुमार ने मुद्दे की सुनवाई की है। न्यायालय में पति (प्रतिवादी) ने अपनी पत्नी (अपीलकर्ता) द्वारा क्रूरता और छोड़े जाने के आधार पर तालाक लेने की याचिका दाखिल की थी, जिसपर न्यायालय ने सुनवाई की। दरअसल, दोनों की विवाह वर्ष 2017 में हुई थी।

पति की मर्जी के बिना पत्नी ने कराया गर्भपात
पति ने इल्जाम लगाया कि विवाह के तुरंत बाद ही उसकी पत्नी उसके परिजनों के साथ दुर्व्यवहार करने लगी। वह लगातार इस बात की धमकी देती थी कि वह दहेज उत्पीड़न के झूठे मुकदमा में उसको और उसके घरवालों को फंसा देगी। साथ ही उसने यह भी इल्जाम लगाया कि उसकी मर्जी के बिना उसकी पत्नी ने कई बार गर्भपात कराया और बिना किसी वजह के ससुराल छोड़कर मायके चली गई। पति ने कहा कि वर्ष 2017 के अक्टूबर महीने में वो फिर ससुराल आई और फिर 15-20 दिन बाद वापस चली गई।
तीन वर्ष से पत्नी रह रही थी अलग
पति ने कहा कि वर्ष 2017 में 12 नवंबर को पत्नी ने पति और उसके परिजनों के विरुद्ध देहज उत्पीनड़ और क्रूरता के मुद्दे में झूठा मुद्दा दर्ज कराया। ट्रायल न्यायालय ने 5 नवंबर, 2019 को प्रतिवादी और उसके परिवार को इन आरोपों से बरी कर दिया। प्रतिवादी ने दावा किया कि अपीलकर्ता ने उसे शारीरिक संबंध बनाने से वंचित करते हुए तीन वर्ष से अधिक समय तक छोड़ दिया था।
फैमिली न्यायालय ने दी थी तलाक की मंजूरी
समन प्राप्त होने के बावजूद, अपीलकर्ता अपना बचाव दाखिल करने के लिए मौजूद नहीं हुई, जिसके कारण 14 जुलाई, 2022 को एक पक्षीय कार्यवाही प्रारम्भ हुई। पारिवारिक न्यायालय ने प्रतिवादी द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों की जांच करने के बाद क्रूरता और परित्याग को तालाक का आधार बताते हुए 3 सितंबर, 2022 को तलाक की स्वीकृति दे दी।
पत्नी ने खटखटाया उच्च न्यायालय का दरवाजा
पत्नी ने पारिवारिक न्यायालय के आदेश के विरुद्ध हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और तर्क दिया कि उसे कार्यवाही में भाग लेने का उचित अवसर नहीं दिया गया और पारिवारिक न्यायालय ने अपने निर्णय में गलती की। उसके वकील ने तर्क दिया कि अपीलकर्ता के विरुद्ध इल्जाम निराधार और साक्ष्य द्वारा समर्थित नहीं थे। अपीलकर्ता ने हाई कोर्ट से आक्षेपित फैसला और डिक्री को रद्द करने का आग्रह किया, यह दावा करते हुए कि एकतरफा कार्यवाही अनुचित जल्दबाजी में की गई थी। निर्णायक रूप से, न्यायालय ने माना कि, वर्तमान मुद्दे में, पारिवारिक न्यायालय ने अपने निर्णय में कोई कानूनी या तथ्यात्मक त्रुटि नहीं की है।

