राष्ट्रीय

नाथूराम गोडसे ने आखिरी बार कहे थे यह शब्द…

आज (15 नवंबर 1949) राष्ट्र की आज़ादी में अहम सहयोग देने वाले मोहनदास करमचंद गांधी (महात्मा गांधी) की निर्मम मर्डर करने वाले नाथूराम गोडसे को फांसी दी गई थी. गांधी को अपना प्रेरणास्त्रोत मानने वाले गोडसे को गांधी मर्डर के इल्जाम में ही फांसी हुई थी. हालांकि, जब नाथूराम गोडसे ने गांधी जी की मर्डर की, उस समय राष्ट्र का हर वर्ग, हर धर्म-मजहब का शख्स उनसे नफरत करने लग गया था, किन्तु जिन लोगों ने गोडसे का आखिरी भाषण सुना, वो अब भी इस मर्डर के लिए गोडसे को कसूरवार नहीं मानते. गांधी मर्डर मुद्दे में सुनवाई कर गोडसे के विरुद्ध निर्णय सुनाने वाले जस्टिस जीडी खोसला ने अपनी क़िताब ‘द हत्या ऑफ़ द महात्मा’ में इस संबंध में एक बहुत अहम टिप्पणी की थी.

Nathuram godse
The triale of persons accused of participation and complicity in mahatma gandhi’s assassination opened in the special court in red fort delhi on may 27, 1948. A close यूपी of the accused persons. Left to right front row: nathuram vinayak godse, narayan dattatraya apte and vishnu ramkrishna karkar. Seated behind are (from left to right) diganber ram chandra badge, shankar s/o kistayya, vinayak damodar savarkar, gopal vinayak godse and dattatrays sadashiv parachure.
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उस टिप्पणी में जस्टिस खोसला ने बोला था कि उस वक़्त न्यायालय में मौज़ूद जनता को यदि न्यायधीश का दर्ज़ा देकर उनसे फ़ैसला सुनाने को बोला जाता, तो निश्चय ही गोडसे भारी बहुमत से गांधी की मर्डर के इल्जाम से ‘निर्दोष’ करार दे दिए जाते. यह वाक़या 17 मई 1949 का है, जब गोडसे को फांसी की सज़ा सुनाई गई थी. सजा सुनाए जाने से पहले गोडसे ने अपना आखिरी भाषण दिया था, जिसमे उन्होंने गांधी जी की मर्डर करने पर अपना पक्ष रखा था. आज हम आपको नाथूराम गोडसे के उसी आखिरी भाषण के बारे में बताने जा रहे हैं, जो उन्होंने न्यायधीश के समक्ष दिया था. जिसे सुनकर न्यायालय में बैठे प्रत्येक शख्स की आंखें नम हो गई थी.

नाथूराम गोडसे का न्यायालय में न्यायधीश के सामने अंतिम बयान:-

‘सम्मान, कर्तव्य तथा अपने राष्ट्र वासियों के प्रति प्यार कभी कभी हमें अहिंसा के सिद्धांत से हटने के लिए बाध्य कर देता है. मैं कभी यह नहीं मान सकता की किसी आक्रामक का सशस्त्र प्रतिरोध करना कभी गलत अथवा अन्याय पूर्ण भी हो सकता है. प्रतिरोध करने और यदि संभव हो तो ऐसे शत्रु को बलपूर्वक वश में करना को मैं एक धार्मिक एवं नैतिक कर्तव्य मानता हूं. मुस्लिम अपनी मनमानी कर रहे थे, या तो कांग्रेस पार्टी उनकी ख़्वाहिश के समक्ष आत्मसर्पण कर दे तथा उनकी सनक, मनमानी और आदिम बर्ताव के स्वर में स्वर मिलाये या उनके बिना काम चलाए. वे अकेले ही हर वस्तु तथा आदमी के निर्णायक थे.

महात्मा गांधी अपने लिए जूरी एवं न्यायधीश दोनों थे. गांधी जी ने मुस्लिमों को प्रसन्न करने के लिए हिंदी भाषा के सौंदर्य तथा सुन्दरता के साथ दुष्कर्म किया. गांधी जी के सारे परीक्षण केवल और केवल हिन्दुओ की मूल्य पर किए जाते थे. जो कांग्रेस पार्टी अपनी राष्ट्र भक्ति एवं समाज वाद का दंभ भरा करती थी. उसी ने गुप्त तौर पर बन्दुक की नोक पर पाक को कबूल कर लिया तथा जिन्ना के समक्ष नीचता से सेरेण्डर कर दिया. मुसलमान तुष्टिकरण की नीति की वजह से हिंदुस्तान माता के टुकड़े कर दिए गए तथा 15 अगस्त 1947 के पश्चात् राष्ट्र का एक तिहाई हिस्सा हमारे लिए ही विदेशी भूमि बन गई. नेहरु तथा उनकी भीड़ की स्वीकारोक्ति के साथ-साथ एक धर्म के आधार पर अलग प्रदेश बना दिया गया. इसी को वे बलिदानों द्वारा जीती गई आजादी कहते है और किसका बलिदान?

वही जब कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेताओ ने गांधी जी के स्वीकृति से इस राष्ट्र को काट डाला, जिसे हम पूजा की वस्तु मानते है, तो मेरा मस्तिष्क घातक क्रोध से भर गया. मैं साहस पूर्वक बोलता हूँ कि गांधी अपने कर्तव्य में असफल हो गए. उन्होंने स्वयं को पाक का पिता होना साबित किया. मैं बोलता हूं की मेरी गोलियां एक ऐसे शख्स पर चलाई गई थी, जिसकी नीतियों एवं कार्यों से करोड़ों हिन्दुओं को केवल बर्बादी एवं विनाश ही प्राप्त हुआ. ऐसी कोई क़ानूनी प्रक्रिया नहीं थी, जिसके द्वारा उस गुनेहगार को सजा दिलाई जा सके, इसलिए मैंने इस खतरनाक मार्ग का अनुसरण किया. मैं अपने लिए माफ़ी की निवेदन नहीं करूंगा, जो मैंने किया उस पर मुझे गर्व है. मुझे कोई शंका नहीं है कि इतिहास के निष्ठावान लेखक मेरे काम का वजन तोल कर भविष्य में किसी दिन इसका उचित मूल्यांकन करेंगे. जब तक सिन्धु नदी हिंदुस्तान के ध्वज के नीचे से ना बहे तब तक मेरी अस्थियों का विसर्जन मत करना.

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