राष्ट्रीय

अपने इस कदम से चीन की रातों की नींद उड़ा सकते हैं पीएम मोदी

जब हम लोग जियोग्राफी और हिस्ट्री की पढ़ाई करते थे. वर्ल्ड ट्रेड के शुरुआती सबक सिखते थे तब स्वेज नहर के बारे में सुनते थे. इससे जुड़ी क्राइसिस के बारे में सुनते थे. 32 किलोमीटर के उस संकड़े रास्ते के बारे में सुनते थे जिस पर कोई आफत आती थी तो एशिया, अफ्रीका और यूरोप के बीच व्यापार की लागत बढ़ जाती थी. हिंदुस्तान की बात करें तो हमारा 20 से 25 फीसदी का वैश्विक व्यापार यही से होकर गुजरता है. हिंदुस्तान के लिए ये रास्ता उसका एनर्जी कॉरिडोर भी है.
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यही से उसका 60 से 65 फीसदी क्रूड आयल इंपोर्ट होता है. ये स्वेज कनाल जिस रेड सी को मेडिटेरेनियन सी से कनेक्ट करता है उस रेड सी की क्राइसिल से दुनिया हूतियों के हमलों से कई बार रूबरू हो चुकी है. इस वजह से इस रूट से गुजरने वाले सभी शिपमेंट को घूमकर साउथ अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप से होकर यूरोप तक जाना पड़ता है. जिस वजह से हर राउंड में एक मिलियन का एक्सट्रा फ्यूल खपत होता है और शिपमेंट की डिलीवरी में भी देरी हो जाती है. वर्तमान समय में हिंदुस्तान और दुनिया के लिए स्वेज कनाल को बायपास कर एक इकोऩॉमिकली सस्ते रास्ते को डेवलप करना सबसे बड़ी आवश्यकता है और इसी आवश्यकता को पूरा करने के लिए आज से दो वर्ष पहले हिंदुस्तान सहित आठ राष्ट्रों ने इण्डिया मीडिल ईस्ट इकोनॉमिक कॉरिडोर को डेवलप करने का घोषणा किया.

ट्रंप ने कहा इतिहास का सबसे महान व्यापार मार्ग
भारत का वो हथियार जिसे चीन का मुकाबला करने के लिए वर्ष 2023 में जी20 की प्रेसिडेंसी के दौरान प्रारम्भ किया गया था. सितंबर 2023 में नयी दिल्ली में जी-20 शिखर सम्मेलन में विश्व नेताओं ने भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (आईएमईसी) की योजना का अनावरण किया था. सऊदी अरब, यूरोपीय संघ, भारत, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), फ्रांस, जर्मनी, इटली और संयुक्त राज्य अमेरिका ने परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता जताते हुए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए. इस परियोजना को चीन की विशाल बेल्ट एंड रोड पहल के लिए एक रणनीतिक प्रतिकार के रूप में देखा जा रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने फरवरी में नरेंद्र मोदी की वाशिंगटन यात्रा के दौरान IMEC के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई थी, और इसे “इतिहास का सबसे महान व्यापार मार्ग” बोला था. लेकिन इजरायल और हमास की युद्ध की आरंभ के बाद से ही हिंदुस्तान का ये हथियार थोड़ा सा कमजोर पड़ गया. यानी इस पर काम आगे नहीं बढ़ पाया. ऐसे में आइए जानते हैं कि आईएईसी क्या है और किस तरह से इस कॉरिडोर के माध्यम से हम चीन को काउंटर कर सकते हैं.
IMEC कॉरिडोर क्या है?
भारत, सऊदी अरब, यूरोपीय संघ, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), फ्रांस, जर्मनी, इटली और संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा प्रस्तावित आईएमईसी रेलमार्ग, जहाज से रेल (सड़क और समुद्र) और सड़क परिवहन मार्गों का एक नेटवर्क है जो दो गलियारों में फैला हुआ है, यानी पूर्वी गलियारा – हिंदुस्तान को खाड़ी से जोड़ता है और उत्तरी गलियारा – खाड़ी को यूरोप से जोड़ता है. प्रस्ताव के अनुसार, आईएमईसी हिंदुस्तान से संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, जॉर्डन, इजरायल और यूरोप तक तथा वापस वस्तुओं और सेवाओं के परिवहन को सक्षम बनाएगा. इसमें शामिल नेताओं ने बोला कि एक बार पूरा हो जाने पर इससे कार्यकुशलता में सुधार आएगा, लागत में कमी आएगी, आर्थिक एकता बढ़ेगी, रोजगार सृजन होगा तथा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी आएगी. जैसा कि विदेश मामलों के जानकार रोबिंदर सचदेव ने साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट को बताया, एक बार बन जाने के बाद, आईएमईसी परिवहन समय में 40 फीसदी तक की कमी लाएगा, जिससे हिंदुस्तान को यूरोपीय बाजारों तक अधिक लागत-प्रभावी पहुंच मिलेगी. नयी दिल्ली में G20 शिखर सम्मेलन में घोषणा किए जाने पर, प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने IMEC को सहयोग, नवाचार और साझा प्रगति का प्रतीक कहा. इस बीच, तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन ने इसे वास्तव में बड़ी बात करार दिया.
ग्लोबल पॉलिटिक्स का भी है अहम रोल
यह गलियारा केवल आर्थिक एकीकरण या जैसा कि कुछ जानकार भू-अर्थशास्त्र के बारे में कहते हैं, के बारे में नहीं है. इसके व्यापक भू-राजनीतिक निहितार्थ भी हैं. कई लोगों का मानना ​​है कि आईएमईसी चीन की बेल्ट एंड रोड को काउंटर करने का एक हथियार है क्योंकि खाड़ी और पश्चिम एशिया में बीजिंग का असर लगातार बढ़ रहा है. अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार आईएमईसी परियोजना को चीन की बीआरआई के विकल्प के रूप में देखा जा सकता है, जिसका नेतृत्व हिंदुस्तान और अमेरिका कर रहे हैं. जानकार बताते हैं कि यह योजना बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का एक जरूरी उत्तर हो सकती है. यदि इसे आखिरी रूप दिया जाता है, तो यह एक गेम चेंजर साबित होगा जो हिंदुस्तान और पश्चिम एशिया के बीच संपर्क को मजबूत करेगा और इसका उद्देश्य बीआरआई का मुकाबला करना होगा
कहां फंस रहा है पेंच
हालाँकि, आईएमईसी के कई फ़ायदों के बावजूद, ऐसी चुनौतियाँ हैं जो इस गलियारे को हकीकत बनने से रोक सकती हैं. सबसे पहले, भू-राजनीतिक तनाव यानी इज़राइल-गाजा युद्ध आईएमईसी की प्रगति को धीमा कर सकता है. इज़राइल के लिए, गाजा में एक स्थायी समझौता निकट भविष्य में आईएमईसी से ऊपर एक नीतिगत अहमियत बनी रहेगी. इससे सऊदी-इज़राइल सामान्यीकरण की संभावनाओं को हानि पहुँचेगा, जिसे कुछ लोग आईएमईसी के संचालन के लिए एक जरूरी शर्त मानते हैं. एक तथ्य यह भी है कि वैसे इजरायल गाजा पर बमबारी जारी रखे हुए है, इसलिए कई अरब राष्ट्रों के लिए यहूदी देश के साथ एक ही मेज पर बैठना कठिन हो जाएगा, क्षेत्रीय एकीकरण परियोजनाओं की योजना बनाना तो दूर की बात है. वित्तपोषण का मामला भी है. वर्तमान में सऊदी अरब ने आईएमईसी के लिए 20 बिलियन $ देने का वादा किया है. हालाँकि, यह 2027 तक परियोजना के लिए G7 द्वारा मांगे गए 600 बिलियन $ का एक छोटा सा अंश है. इसके अलावा, किसी भी सदस्य राष्ट्र के पास आईएमईसी के लिए कोई वित्तीय दायित्व नहीं है, जिससे वित्तपोषण का अधिकतर दृष्टिकोण अनिश्चित है. कई भू-राजनीतिक जानकारों का मानना ​​है कि IMEC में मिस्र, ओमान और तुर्की जैसे क्षेत्रीय खिलाड़ियों की अनुपस्थिति समस्याजनक हो सकती है.
इन सब से हिंदुस्तान को क्या लाभ होगा?
लेकिन कई मुद्दों के बावजूद, विश्लेषकों का मानना ​​है कि आईएमईसी के चालू होने के बाद यह कई मायनों में हिंदुस्तान के लिए बहुत फ़ायदेमंद होगा. रोबिंदर सचदेव ने साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट को कहा कि आईएमईसी हिंदुस्तान की कनेक्टिविटी, आर्थिक अवसरों और वैश्विक स्थिति को बढ़ाता है, साथ ही जी7 और क्षेत्रीय खिलाड़ियों के साथ साझेदारी में चीन की [बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव] के लिए एक बहुपक्षीय प्रतिसंतुलन के रूप में भी काम करता है. इससे नयी दिल्ली को पश्चिमी दुनिया, खास तौर पर यूरोप के साथ संबंधों को मजबूत करने में भी सहायता मिलेगी. यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी अप्रत्याशितता से विश्व प्रबंध को बदल रहे हैं.

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