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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए कहा…

  पीएम मोदी ने हाल ही में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए बोला कि कांग्रेस पार्टी पार्टी की गवर्नमेंट वाले राज्य शाही परिवार के लिए एटीएम बन गए हैं, महाराष्ट्र में ऐसा नहीं होने दिया जाएगा. इस पर माकपा नेता मोहम्मद सलीम ने उनकी निंदा की है.

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मोहम्मद सलीम ने आईएएनएस से बात करते हुए कहा, “अगर कोई भी पार्टी सियासी करप्शन या शाही परिवारों की बात करती है, तो मुझे लगता है कि बीजेपी को इस मुद्दे से थोड़ी दूरी बनाए रखनी चाहिए थी, और संघ परिवार को भी. आज बीजेपी दुनिया में सबसे अमीर पार्टी है. प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी के बाद कैशलेस का नारा दिया था, लेकिन चुनावों में सबसे अधिक नकदी का इस्तेमाल बीजेपी कर रही है. चाहे दलबदलू खरीदने की बात हो, प्रचार के लिए पैसे का इस्तेमाल हो, या एजेंसियों को काम पर लगाना हो, पैसे का मुद्दा हर स्थान है. यदि कोई पार्टी एटीएम जैसा काम करती है, तो क्या यह ठीक है? क्या वसूली के लिए ईडी, CBI और अन्य केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल करना ठीक है? जिन बड़े-बड़े पूंजीपतियों को बीजेपी अपने साथ लेकर चलती है, क्या उन्हें प्रणाम किए बिना कोई भी काम हो सकता है? यह सब करप्शन की तरफ इशारा करता है.

उन्होंने आगे कहा, “अगर करप्शन की बात करें, तो कांग्रेस पार्टी के समय में भी कई बड़े घोटाले हुए थे जैसे कोल स्कैम, 2जी स्कैम. लेकिन बीजेपी जब सत्ता में आई तो इन पर ठोस कदम क्यों नहीं उठाए? प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी की थी और बोला था कि इससे करप्शन समाप्त हो जाएगा, लेकिन आज भी जो सबसे अधिक करप्शन के मुद्दे सामने आते हैं, वे बीजेपी के नेताओं के हैं. हमारे बंगाल में जहां बीजेपी सत्ता में नहीं आई, वहां भी कई करप्शन के मुद्दे सामने आए हैं, और जो लोग करप्शन के आरोपों में थे, वे बीजेपी में शामिल हो गए.

उन्होंने कहा, “पीएम मोदी चुनाव प्रचार में करप्शन के विरुद्ध बातें करते हैं, लेकिन पीएम के रूप में उन्हें यह दिखाना चाहिए कि कितने भ्रष्टाचारी नेताओं को पकड़ा गया. आठ वर्ष पहले, अरुण जेटली ने बोला था कि नोटबंदी के बाद उनके पास पूरा डाटा होगा और काले धन का हिसाब आएगा, लेकिन अब तक इस मुद्दे में कितने लोगों को पकड़ा गया? प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने विदेशों से ब्लैक मनी लाने की बात की थी, और व्हाट्सएप पर यह मैसेज भी वायरल हुआ था कि कौन सा नेता कितना पैसा विदेश में रखता है. लेकिन आज वह पैसा कहां गया? स्विस बैंक, जर्मन बैंक, या लक्जेमबर्ग बैंक से वह पैसा आया क्यों नहीं?”

इसके बाद उन्होंने बीजेपी नेताओं के बंटेंगे तो कटेंगे और एक हैं तो सेफ हैं वाले बयान पर कहा, “भाजापा की अपनी कोई स्थायी विचारधारा नहीं है. सीएम बनने से पहले, यदि आप योगी आदित्यनाथ का इतिहास देखें, तो पता चलेगा कि उन्होंने किस तरह से लोगों को बांटा. सीएम बनने के बाद, उनकी नीतियां भी लोगों को बांटने वाली ही रही हैं. जब सीएए के समय यूपी से लोग दिल्ली आए थे, तो किस तरह से वहां फसाद किए गए और लोगों को बांटा गया, यह हमने देखा.

उन्होंने आगे कहा, “जब धर्म की बात होती है, तो फिर यह प्रश्न उठता है कि जाति के आधार पर लोगों को क्यों बांटा जा रहा है? यदि आप धर्म के नाम पर राजनीति कर रहे हैं, तो फिर जाति के नाम पर भेदभाव क्यों? यदि हम सभी एक नहीं होंगे, तो अंत में हम टूट जाएंगे. यही कारण है कि हमें शांति से जीने की आदत डालनी होगी, और यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो हम टुकड़ों में बंट जाएंगे. हम तो एकता चाहते हैं, एक साथ रहना चाहते हैं, लेकिन जो लोग बंटवारे की राजनीति कर रहे हैं, वे चुनाव के दौरान भी लोगों की नाराजगी भूल जाते हैं.

अलीगढ़ मुसलमान यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक दर्जे के मुद्दे में सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संविधान पीठ में चार न्यायाधीशों ने अल्पसंख्यक दर्जे को बहाल रखने की बात कही है. इस पर सीएम योगी आदित्यनाथ ने बोला कि जो राष्ट्र के पैसे से चलता है वह केवल अल्पसंख्यकों के लिए कैसे हो सकता है.

इस संबंध में माकपा नेता ने कहा, “योगी आदित्यनाथ को गर्व महसूस करना चाहिए कि यूपी में एक ऐसा यूनिवर्सिटी है, जो न सिर्फ़ देशभर में, बल्कि तरराष्ट्रीय स्तर पर भी मशहूर है. लेकिन योगी को यह देखना चाहिए कि राज्य विश्वविद्यालयों जैसे इलाहाबाद विश्वविद्यालय, जो पहले से ही काफी अच्छे थे, उन्हें और बेहतर क्यों नहीं बनाया जा रहा है? इसकी बजाय, वह केंद्रीय विश्वविद्यालयों जैसे बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी और अलीगढ़ मुसलमान यूनिवर्सिटी को क्यों निशाना बना रहे हैं? यह सिर्फ़ अलीगढ़ या जेएनयू का मुद्दा नहीं है; यह एक बड़ा मामला है.

उन्होंने आगे कहा, “जो दक्षिणपंथी विचारधारा वाले लोग हैं, वे अक्सर विश्वविद्यालयों पर धावा करते हैं क्योंकि विश्वविद्यालयों में जो शिक्षा और अध्ययन होता है, वह लोगों के भीतर प्रगति की भावना पैदा करता है और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है. जो प्रतिक्रियावादी ताकतें हैं, वे इन संस्थानों को समाप्त करना चाहती हैं, क्योंकि ये जगह खुलकर विचार, बहस और नवाचार को बढ़ावा देते हैं. वे लाइब्रेरी, यूनिवर्सिटी और विद्यालयों के विरुद्ध होते हैं, क्योंकि यह जगहें सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन की धारा बनाती हैं. अलीगढ़ मुसलमान यूनिवर्सिटी की अपनी एक ऐतिहासिक परंपरा है, और आज वहां के विद्यार्थी और शिक्षक सिर्फ़ मुसलमान नहीं हैं. यूनिवर्सिटी में सभी धर्मों और जातियों के लोग पढ़ाई करते हैं और कार्य करते हैं. इसलिए, योगी आदित्यनाथ को इसे निशाना बनाने की बजाय, उन्हें केंद्र गवर्नमेंट से यह निवेदन करना चाहिए कि अलीगढ़ मुसलमान यूनिवर्सिटी को और बेहतर बनाने के लिए उसे अधिक संसाधन मौजूद कराए जाएं, ताकि यह और अधिक उत्कृष्टता की ओर बढ़ सके.

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