राष्ट्रीय

2024 में SC ने जारी किए ये ऐतिहासिक फैसले

साल 2024 का आज आखिरी दिन है, कल से पूरे विश्व में नए वर्ष का आगाज़ हो जाएगा. इस वर्ष में  देश-दुनिया में कई तरह के परिवर्तन हुए कुछ सकारात्मक, तो कुछ नकारात्मक भी. लेकिन, हिंदुस्तान की न्यायपालिका की दृष्टि से 2024 ऐतिहासिक बदलावों का साल रहा है. राष्ट्र की सर्वोच्च न्यायालय ने इस वर्ष कई अहम और विवादास्पद मामलों में निर्णय सुनाए, जिन्होंने न सिर्फ़ कानूनी ढांचे को बल्कि राष्ट्र के सियासी और सामाजिक ढाँचे को भी नया रूप दिया.

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इन फैसलों में चुनावी बॉन्ड योजना को रद्द करना, रिश्वतखोरी से जुड़े मुद्दे में विधायकों की विधायी प्रतिरक्षा को खारिज करना, और मदरसा शिक्षा के विनियमन जैसी जरूरी बातें शामिल हैं. इन फैसलों ने संविधान के विभिन्न पहलुओं पर गहरे असर डाले हैं और कई मुद्दों पर समाज में बहस को हवा दी है.

चुनावी बॉन्ड योजना को रद्द करना:- 

15 फरवरी 2024 को उच्चतम न्यायालय ने चुनावी बॉन्ड योजना को गैरकानूनी करार देते हुए इसे रद्द कर दिया था. इस बॉन्ड से पहले राजनितिक दल अधिकांश नकद में चंदा लिया करते थे, किसको कितना पैसा, किससे मिला? इसकी कोई जानकारी मौजूद नहीं होती थी. गवर्नमेंट इसी में पारदर्शिता लाने के लिए चुनावी बॉन्ड योजना लाइ थी, जिसमे दान देने वाला व्यक्ति, बैंक के जरिए दान लेने वाली पार्टी के बॉन्ड खरीदता था और वो पैसा पार्टी के बैंक एकाउंट में जाता था, जिसका हिसाब बैंक और पार्टी के पास उपस्थित रहता था और पारदर्शिता भी बनी रहती थी की किस व्यक्ति ने किस पार्टी को कितना चंदा दिया.

लेकिन, उच्चतम न्यायालय ने इसे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के अनुसार सूचना के मौलिक अधिकार का उल्लंघन माना. न्यायालय ने अपने फैसले में बोला कि चुनावी बॉन्ड्स के जरिए किए गए गुमनाम दान ने सियासी फंडिंग में पारदर्शिता को कम किया, जिससे लोकतंत्र कमजोर हुआ. इसके चलते इनकम टैक्स अधिनियम, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम और कंपनी अधिनियम में किए गए संशोधन अमान्य कर दिए गए, जिससे अनियमित और गुमनाम कॉर्पोरेट दान को बढ़ावा मिलता था.

रिश्वतखोरी में विधायक-सांसदों की सुरक्षा खत्म:-

4 मार्च 2024 को उच्चतम न्यायालय ने झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के कैश-फॉर-वोट मुद्दे में अपने 1998 के निर्णय को पलटa दिया था.  ये निर्णय पैसे लेकर वोट बेचने से जुड़ा था, उस समय केंद्र में नरसमीहा राव के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी की गवर्नमेंट थी, लेकिन जब गवर्नमेंट अल्पमत में आई, तो संसद में फ्लोर टेस्ट रखा गया. तब कांग्रेस पार्टी द्वारा 50-50  लाख रुपए नकद देकर JMM के सांसदों के वोट ख़रीदे गए थे. अन्यथा उस समय कांग्रेस पार्टी गवर्नमेंट गिर गई होती. तत्कालीन विपक्षी नेता अटल बिहारी वाजपाई ने संसद में इसका भंडाफोड़ किया था, सांसदों ने स्वयं कबूला था कि कांग्रेस पार्टी द्वारा उन्हें कारों में भरकर नोट भेजे गए थे. मुद्दा उच्चतम न्यायालय तक पहुंचा, लेकिन न्यायालय ने ये कहते हुए किसी को भी सजा देने से मना कर दिया कि रिश्वतखोरी पर सांसदों-विधयकों को सजा देने का कोई कानून नहीं है.

अब 26 वर्ष बाद उच्चतम न्यायालय ने अपना ही निर्णय पलट दिया है और बोला है कि, सांसदों-विधायकों को रिश्वतखोरी जैसे आपराधिक कृत्यों से छूट नहीं मिल सकती. न्यायालय ने यह साफ किया कि संसदीय विशेषाधिकार सिर्फ़ विधायी कार्यों तक सीमित हैं और यह करप्शन या आपराधिक कृत्य जैसे मामलों को कवर नहीं कर सकते. लेकिन, अब किसे सजा दी जा सकती है, अब तो ना वो नेता रहे, और न वो सांसद. वो अपनी सत्ता भोगकर जा चुके.

SC/ST आरक्षण में क्रीमी लेयर:-

1 अगस्त 2024 को उच्चतम न्यायालय ने अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों के भीतर उप-वर्गीकरण की स्वीकृति दी, जिसमे क्रीमी लेयर की पहचान कर उन लोगों को फायदा देने की सिफारिश की गई थी, जो आरक्षण के फायदा से वंचित हैं. इसका उद्देश्य इन समुदायों के भीतर असमानताओं को दूर करना था, ताकि सबसे वंचितों को भी फायदा का उचित हिस्सा मिल सके, लेकिन इसके विरोध में SC/ST के ही कुछ समुदाय उतर आए और उच्चतम न्यायालय के निर्णय को मानने से मना कर दिया.

सियासी जानकारों द्वारा बोला गया कि विरोध करने वाले उस संदुआय के लोग हैं, जो सबसे अधिक आरक्षण का फायदा लेते हैं, और SC/ST की अन्य जातियों को फायदा नहीं देना चाहते. वहीं, जो सचमुच पिछड़े दलित-आदिवासी थे, उन्होंने इस निर्णय का समर्थन भी किया और रैलियां निकाली, क्योंकि उच्चतम न्यायालय का ये निर्णय उन्हें हक़ दिलाने वाला था. न्यायालय ने निर्देश दिया कि राज्य सरकारें इन समुदायों के भीतर उप-श्रेणियां बना सकती हैं, ताकि आरक्षण का फायदा अधिक सूक्ष्म रूप से वितरित किया जा सके. अब इस निर्णय को लागू करना राज्य सरकारों पर है, जो अपने राज्य की स्थिति के हिसाब से इस पर निर्णय लेंगी.

‘बुलडोजर न्याय’ पर रोक:-

अपराधियों और अतिक्रमणकारियों पर गरजने वाले बुलडोज़र ने भरत से लेकर पूरे विश्व में सुर्खियां बटोरीं थीं. वैसे आम जनता इससे खुश थी, क्योंकि अपराधियों पर हो रहा एक्शन उन्हें भा रहा था. लेकिन, हिंदुस्तान में कुछ नेताओं और धर्मगुरुओं ने इसे इस तरह पेश किया कि बुलडोज़र के जरिए मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है. जिसके बाद ये मुद्दा जमकर उछला और जमीयत उलेमा हिन्द की याचिका पर उच्चतम न्यायालय सुनवाई के लिए तैयार हो गया. 13 नवंबर 2024 को उच्चतम न्यायालय ने उन कार्रवाइयों की कड़ी आलोचना की, जिन्हें ‘बुलडोजर न्याय’ बोला जाता है.

सुप्रीम न्यायालय ने तीखी टिप्पणियां करते हुए बुलडोज़र कार्रवाई पर रोक लगा दी, हालाँकि, उचित प्रक्रिया के माध्यम से कब्ज़ा हटाने की छूट दी. शीर्ष न्यायालय ने इसे गैरकानूनी माना और बोला कि ऐसा सिर्फ़ तभी किया जा सकता है जब कानून के अनुसार उचित प्रक्रिया अपनाई जाए. यह निर्णय खासकर उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में हुईं ऐसी कार्रवाइयों के संदर्भ में था, जहां गैरकानूनी रूप से निर्मित ढांचे बुलडोज़र से जमींदोज़ किए गए  थे.

नागरिकता अधिनियम की धारा 6ए की संवैधानिकता पर मुहर:- 

CAA कानून आने के समय से ही पूरा विपक्ष एक सुर में इसे गैरकानूनी बता रहा था, लेकिन उच्चतम न्यायालय ने इसका भी निर्णय कर दिया. अक्टूबर 2024 में उच्चतम न्यायालय ने नागरिकता अधिनियम (CAA) की धारा 6ए की संवैधानिकता को कायम रखा, जो असम में बांग्लादेश से आए प्रवासियों को नागरिकता प्रदान करता है. न्यायालय ने इस प्रावधान को असम की जनसांख्यिकीय समस्याओं और ऐतिहासिक संदर्भ को ध्यान में रखते हुए ठीक ठहराया.

उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम को रखा बरक़रार:-  

5 नवंबर 2024 को सर्वोच्च कोर्ट ने यूपी मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम, 2004 को कानूनी करार देते हुए इसकी वैद्यता को बरक़रार रखा. हालांकि, इलाहबाद उच्च न्यायालय ने इसे पहले गैरकानूनी मानते हुए रद्द कर दिया था, पर उच्चतम न्यायालय ने इस निर्णय को पलट दिया. न्यायालय ने इस फैसला को पलटते हुए बोला कि यह कानून धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के विरुद्ध नहीं है. न्यायालय ने यह भी बोला कि यदि राज्य गवर्नमेंट के पास विधायी क्षमता है तो ही कोई कानून रद्द किया जा सकता है. दरअसल, इसका विरोध करते हुए बोला गया था कि, मदरसा बोर्ड बच्चों को अच्छी शिक्षा देने में असफल रहा है, इसलिए बच्चों को मदरसों से निकालकर सामान्य विद्यालयों में भर्ती कराया जाए, जहाँ वे अच्छी तालीम ले सकें. हालाँकि, उच्चतम न्यायालय ने इस तर्क को नहीं माना.

सुप्रीम न्यायालय के इन फैसलों ने हिंदुस्तान के न्यायिक और कानूनी ढांचे को नए आयाम दिए हैं और समाज में जरूरी मुद्दों पर चर्चा को बढ़ावा दिया है. इन निर्णयों ने कानूनी प्रक्रियाओं की स्पष्टता और पारदर्शिता को सुनिश्चित करने की दिशा में जरूरी कदम उठाए हैं. राष्ट्र को आशा है कि आनें वाले नववर्ष में भी हिंदुस्तान की न्यायपालिका जनहित में निर्णय करती रहेगी.

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