राष्ट्रीय

सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर केंद्र पर दागे सवाल

सुप्रीम न्यायालय ने सोमवार को निःशुल्क सरकारी योजनाओं पर गंभीर प्रश्न उठाते हुए बोला कि “फ्री की रेवड़ी” कब तक बांटी जाएगी.न्यायालय ने सुझाव दिया कि Covid-19 महामारी के पश्चात् से निःशुल्क राशन का फायदा ले रहे प्रवासी श्रमिकों के लिए रोजगार के अवसर एवं क्षमता निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए.

Images 2024 12 10t101508. 522

WhatsApp Group Join Now

जस्टिस सूर्यकांत एवं जस्टिस मनमोहन की पीठ ने मुद्दे की सुनवाई करते हुए आश्चर्य व्यक्त किया जब केंद्र गवर्नमेंट ने जानकारी दी कि वर्तमान में 81 करोड़ लोगों को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के अनुसार निःशुल्क या रियायती राशन दिया जा रहा है. पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से कहा, “इसका मतलब है कि सिर्फ़ टैक्सपेयर्स ही ऐसे लोग हैं जो इस योजना से बाहर हैं.

यह मुद्दा एक NGO द्वारा दाखिल याचिका से जुड़ा था. NGO की तरफ से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि “ई-श्रमिक” पोर्टल पर दर्ज़ प्रवासी श्रमिकों को निःशुल्क राशन का फायदा दिया जाना चाहिए. भूषण ने बोला कि न्यायालय ने पहले भी केंद्र और राज्यों को निर्देश दिया था कि प्रवासी श्रमिकों के लिए राशन कार्ड जारी किए जाएं जिससे वे केंद्र गवर्नमेंट द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का फायदा उठा सकें. उन्होंने यह भी कहा कि हाल ही में एक आदेश में साफ किया गया था कि जिन प्रवासी श्रमिकों के पास राशन कार्ड नहीं हैं, किन्तु वे “ई-श्रमिक” पोर्टल पर दर्ज़ हैं, उन्हें निःशुल्क राशन मिलना चाहिए.

अदालत ने इस पर टिप्पणी करते हुए बोला कि निःशुल्क योजनाएं कब तक चलाई जाएंगी.  न्यायालय ने इस प्रश्न को उठाया- “हम प्रवासी श्रमिकों के लिए रोजगार के अवसर और क्षमता निर्माण पर ध्यान क्यों नहीं देते?”. जस्टिस सूर्यकांत ने बोला कि यह एक जटिल मामला है. उन्होंने कहा, “जैसे ही हम राज्यों को सभी प्रवासी श्रमिकों को निःशुल्क राशन देने का निर्देश देंगे, मजदूर राज्यों से बाहर चले जाएंगे, क्योंकि उन्हें पता है कि केंद्र इस जिम्मेदारी को उठाएगा.” अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि यदि 2021 की जनगणना हो गई होती, तो प्रवासी श्रमिकों की संख्या में वृद्धि का आकलन हो सकता था. लेकिन वर्तमान में केंद्र गवर्नमेंट 2011 की जनगणना के आंकड़ों पर आधारित योजनाएं चला रही है, जो आज के समय में पर्याप्त नहीं हैं.

अदालत ने केंद्र और राज्यों के बीच जिम्मेदारियों के बंटवारे पर भी विचार किया. बेंच ने कहा, “हम केंद्र और राज्यों के बीच मतभेद नहीं पैदा करना चाहते, क्योंकि इससे स्थिति और जटिल हो जाएगी.न्यायालय ने यह भी सुझाव दिया कि केंद्र और राज्यों को मिलकर योजनाओं का क्रियान्वयन करना चाहिए ताकि जरूरतमंदों को ठीक फायदा मिले.

इस मुद्दे ने निःशुल्क योजनाओं के दीर्घकालिक असर एवं उनकी सामाजिक-आर्थिक नीतियों पर प्रश्न खड़े किए हैं. न्यायालय ने साफ किया कि अब समय आ गया है कि सरकारें निःशुल्क योजनाओं से परे जाकर रोजगार सृजन और आत्मनिर्भरता पर ध्यान केंद्रित करें.

Back to top button