राष्ट्रीय

‘गाली बंद घर अभियान’ के तहत खत्म हो सकती है सबसे बड़ी दुविधा

महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी (एमडीयू) के प्रोफेसर सुनील जगलान, जो ‘गाली बंद घर अभियान’ के माध्यम से अमर्यादित भाषा के प्रयोग को रोकने के अपने लगातार प्रयासों के लिए जाने जाते हैं, ने इस साल रक्षाबंधन को एक सार्थक संदेश के साथ मनाने के लिए एक विशेष पहल प्रारम्भ की है.

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इस अभियान के तहत, जगलान ने हरियाणा भर की स्त्रियों को 3,000 से ज़्यादा पोस्टकार्ड छपवाकर भेजे हैं, जिनमें उनसे आग्रह किया गया है कि वे अपने ससुरों को इस रक्षाबंधन पर यह संकल्प लेने के लिए प्रेरित करें कि वे अपने दैनिक जीवन में अमर्यादित भाषा का प्रयोग न करें. उन्होंने बहनों को राखी के पवित्र धागे को सम्मानजनक भाषा के प्रतीकात्मक कवच में बदलने के लिए प्रोत्साहित किया है.

इस संदेश को और व्यापक बनाने के लिए, स्त्रियों को अपने भाइयों द्वारा राखी बाँधते हुए और भाषा-सम्मान की शपथ लेते हुए वीडियो साझा करने के लिए भी आमंत्रित किया जा रहा है. यह अभियान सोशल मीडिया पर इन वीडियो को प्रदर्शित करेगा और चयनित प्रतिभागियों को आनें वाले कार्यक्रम में सम्मानित किया जाएगा.

जींद ज़िले के बीबीपुर गाँव के पूर्व सरपंच जगलान ने कहा, “हमने इस अभियान का नाम ‘रक्षा बंधन की डोर, गाली बंधन की ओर’ रखा है. रक्षा बंधन भाई-बहन के प्यार का उत्सव तो है ही, यह सुरक्षा का वादा भी है. इस वर्ष हम इसमें एक नया आयाम जोड़ रहे हैं: भाषा और सम्मान की रक्षा.

उन्होंने ज़ोर देकर बोला कि गाली-गलौज एक सामाजिक बुराई है और जिस तरह भाई अपनी बहनों की रक्षा करने की कसम खाते हैं, उसी तरह उन्हें एक दयालु और सम्मानजनक समाज बनाने में भी सहयोग देना चाहिए. उन्होंने आगे बोला कि यह अभियान हर घर के दिल से प्रारम्भ होकर, वाणी और व्यवहार में संवेदनशीलता को बढ़ावा देने की दिशा में एक कदम है.

जगलान ने हाल ही में अपने “गाली बंद घर अभियान” के अनुसार किए गए 11 वर्ष के एक व्यापक सर्वेक्षण के निष्कर्ष जारी किए हैं. इससे पता चलता है कि हिंदुस्तान भर में लगभग 55 फीसदी पुरुष और महिलाएं अपनी दैनिक वार्ता में गाली-गलौज का इस्तेमाल करते हैं. सर्वेक्षण सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में किया गया, जिसमें दिल्ली में सबसे ज़्यादा 80 फीसदी गाली-गलौज का प्रचलन दर्ज किया गया, उसके बाद पंजाब का जगह रहा, जबकि कश्मीर में सबसे कम 15 फीसदी गाली-गलौज का प्रचलन दर्ज किया गया.

उन्होंने कहा कि इस शोध में पिछले 11 सालों में कई राज्यों के 70,000 से ज़्यादा लोगों को शामिल किया गया, जिनमें छात्र, अभिभावक, शिक्षक, डॉक्टर, पुलिसकर्मी, वकील और अन्य पेशेवर शामिल थे. उन्होंने कहा कि इस शोध में यूपी में 11,300, मध्य प्रदेश में 8,400, राजस्थान में 6,100, पंजाब में 4,200, महाराष्ट्र में 3,800 और दिल्ली, गुजरात, बिहार, कश्मीर, उत्तराखंड, गोवा और पश्चिम बंगाल में ऐसे अन्य मुद्दे सामने आए. जगलान ने आगे कहा, “हम पूरे दक्षिण एशिया में इसी तरह के सर्वेक्षण करने और पूरे विश्व से स्त्रियों के प्रति अपमानजनक भाषा को समाप्त करने की दिशा में काम करने की योजना बना रहे हैं. अपमानजनक भाषा एक मानसिक रोग है और पूरे विश्व में कई शब्द स्त्रियों की गरिमा को सीधे तौर पर ठेस पहुँचाते हैं.

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