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यमुना का जलस्तर 207.48 मीटर पर किया गया रिकॉर्स्थिड

दिल्ली में बाढ़ की स्थिति है यमुना का जलस्तर 207.48 मीटर पर रिकॉर्स्थिड किया गया बाढ़ का पानी दिल्ली सचिवालय के इर्द-गिर्द के इलाकों तक पहुंचा तो नोएडा के कई हिस्सों में घुस गया है क्या आपको मालूम है कि दिल्ली में सबसे विशाल बाढ़ कब आई थी तब बाढ़ ने दिल्ली में बहुत तबाही मचाई थी ये सिर्फ़ दिल्ली ही नहीं बल्कि उत्तर हिंदुस्तान में हरियाणा, यूपी और पंजाब की सबसे बड़ी बाढ़ों में गिनी जाती है

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दिल्ली की सबसे विशाल बाढ़ 1978 में आई थी यही महीना था यानि सितंबर काफी अधिक बारिश और हिमालय से पानी के तेज़ बहाव की वजह से दिल्ली में बाढ़ आ गई हरियाणा और यूपी में भी हुई तेज बारिश ने दिल्ली की हालत और खराब कर दी

नदी के कैचमेंट एरिया से इतना पानी आया कि यमुना अपने रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई तब हथिनीकुंड (तब ताजेवाला बैराज बोला जाता था) से भारी मात्रा में पानी छोड़ा गया, जिसने सीधे दिल्ली में बाढ़ आ गई

द हिन्दू अखबार में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, उस बाढ़ के गवाह रहे लोग आज भी उसे याद करके डर जाते हैं रातों रात नदी उफनता पानी घरों तक आ पहुंचा था सभी अपनी जान को लेकर बहुत डरे हुए थे यहां से निकलने की कोई ऐसी सुविधा नहीं थी तो सैकड़ों लोगों ने अपनी छतों पर ही शरण ली थी नये बने हुए बांध ने जरूर इस बाढ़ की विभीषिका को थोड़ा थामा था तब लोगों ने थोड़ी-बहुत रोटी, आटा, पानी और दवाइयां इकट्ठा करके कई दिनों तक अपनी छत पर डेरा जमाए रखा

सबसे उच्च स्तर पर पहुंचा था यमुना का जलस्तर

तब यमुना का जलस्तर मौजदा जलस्तर से हल्का सा ऊपर था, ये 207.49 मीटर हो गया था हालांकि 2023 में भी पानी 208 मीटर के करीब गया, मगर 1978 की तरह तबाही नहीं हुई

1978 में दिल्ली के बड़े हिस्से जलमग्न हो गए खासकर निचले क्षेत्र जैसे गेट नंबर-1 से लेकर कश्मीरी गेट, लोहे का पुल, आईटीओ, यमुना बाजार, गांधीनगर, यमुना पार वाला क्षेत्र पानी में डूब गए यमुना पार की बस्तियां पूरी तरह पानी में चली गईं हजारों घर ढह गए, लाखों लोग बेघर हुए प्रशासन को लाल किला, राजघाट और यमुना किनारे के इलाकों से लोगों को नावों और ट्रैक्टरों से निकालना पड़ा

रेलें और बसें रुक गईं, राहत शिविर भर गए थे

तब दिल्ली में करीब 3 से 5 लाख लोग प्रभावित हुए कई दिनों तक दिल्ली में रेल और सड़क यातायात बाधित रहा गवर्नमेंट ने लोगों को राहत शिविरों में रखा उस दौर में दिल्ली की जनसंख्या आज की तुलना में कम थी लेकिन इस बाढ़ से पहली बार दिल्ली जैसे “मेट्रोपोलिटन शहर” में बड़ी अव्यवस्था और विस्थापन देखने को मिला

फिर बाढ़ नियंत्रण पर काम प्रारम्भ हुआ

1978 की बाढ़ के बाद दिल्ली में बाढ़ नियंत्रण योजनाओं पर गंभीरता से काम प्रारम्भ हुआ यमुना के किनारे तटबंधों को मज़बूत करने, बाढ़ चेतावनी सिस्टम और ड्रेनेज सुधारने की दिशा में योजनाएं बनीं लोगों की स्मृति में यह बाढ़ आज भी सबसे बड़ी आपदा मानी जाती है 1978 की बाढ़ ने दिल्ली को यह सबक दिया कि यमुना केवल एक शांत नदी नहीं, बल्कि गुस्से में आने पर शहर को पंगु बना सकती है

कितने दिनों तक दिल्ली में रही बाढ़

ये बाढ़ करीब 5-6 दिनों तक दिल्ली में बनी रही बाढ़ का पूरा असर करीब 10–12 दिनों तक चला, क्योंकि राहत और पुनर्वास में लंबा समय लगा उस दौर में पंपिंग सिस्टम और ड्रेनेज इतना विकसित नहीं था, इसलिए पानी शीघ्र निकल नहीं पाया कई इलाक़ों में 10 दिन बाद भी कीचड़ और गंदगी बनी रही सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक़ 18 लोग मारे गए करीब 3.5 लाख लोग प्रभावित हुए हज़ारों घर उजड़ गए

3–4 सितंबर 1978 – यमुना का जलस्तर तेजी से बढ़ना प्रारम्भ हुआ
5 सितंबर – पानी ने घातक स्तर (207 मीटर के करीब) छू लिया चारों पुल (लोहे का पुल, वजीराबाद, ओखला, आईटीओ क्षेत्र का पुल) एहतियातन 48 घंटे के लिए बंद कर दिए गए
6 सितंबर (रात तक) – यमुना का जलस्तर 207.47 मीटर पहुंच गया यह सबसे ऊंचा स्तर था उस दिन हालात “बहुत खतरनाक” घोषित किए गए
7–8 सितंबर – बाढ़ का पानी दिल्ली के निचले इलाकों (कश्मीरी गेट, यमुना बाजार, राजघाट, शांति वन, विजय घाट, यमुना पार बस्तियां) में गहराई तक भरा रहा
9 सितंबर से आगे – धीरे-धीरे जलस्तर गिरने लगा, लेकिन पानी उतरने और लोगों को राहत देने में कई दिन लगे

नदी के खतरे के निशान के कितने स्तर

निगरानी स्तर – ये खतरे के निशान से नीचे का एक स्तर होता है जब पानी इस स्तर को पार करता है, तो अधिकारी सावधान हो जाते हैं नदी के जलस्तर पर नज़र बढ़ा देते हैं ये एक शुरुआती चेतावनी की तरह है

खतरे का निशान – ये वो स्तर है, जहां से स्थिति गंभीर होनी प्रारम्भ होती है नज़र बढ़ा दी जाती है खतरे के निशान को पार करना एक अर्ली वार्निंग सिस्टम की तरह है इसका मुख्य उद्देश्य प्रशासन और जनता को समय रहते सचेत करना और आपदा से निपटने के लिए तैयारी प्रारम्भ करना है ताकि जान-माल के हानि को कम से कम किया जा सके “खतरे का निशान” वास्तव में एक चेतावनी का पहला स्तर है

जब पानी इस रेखा को पार करता है, तो इसका मतलब है कि नदी अपने किनारों से ऊपर बहने लगेगी और इर्द-गिर्द के निचले इलाकों में बाढ़ का पानी घुसने लगेगा

अत्यंत खतरे का निशान – जब पानी इस स्तर को पार करता है, तो स्थिति बहुत गंभीर हो जाती है बड़े पैमाने पर तबाही की संभावना रहती है बचाव और राहत कार्य तेज कर दिए जाते हैं

अभूतपूर्व स्तर (Unprecedented Level) – ये वो स्थिति है जब नदी का जलस्तर अब तक के Record किए गए “सबसे ऊँचे बाढ़ स्तर” से भी ऊपर चला जाता है यह एक अप्रत्याशित और बहुत विध्वंसक स्थिति होती है

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