मथुरा श्रीकृष्ण जन्मभूमि मामले में फैसला आज, हिंदू पक्ष का दावा…
श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह टकराव मुद्दे में दाखिल 18 याचिकाओं पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय आज निर्णय सुनाएगा. जस्टिस मयंक कुमार जैन की सिंगल बेंच ने 31 मई 2024 को निर्णय सुरक्षित रख लिया था. श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह को लेकर 18 याचिकाओं में लगभग एक जैसी ह

हिंदू पक्ष का दावा है कि शाही ईदगाह का ढाई एकड़ का एरिया कोई मस्जिद नहीं, वह भगवान कृष्ण का गर्भगृह है. मुसलमान पक्ष बोलना है कि समझौता 1968 का है. 60 वर्ष बाद समझौते को गलत बताना ठीक नहीं. केस सुनवाई लायक नहीं है. बता दें कि मथुरा टकराव को लेकर दाखिल किए गए 18 मुकदमों की सुनवाई अयोध्या टकराव की तर्ज पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में हो रही है. सारे मुद्दे को एक कर सुनवाई चल रही है.
फैसले से पहले श्रीकृष्ण जन्मस्थान पहुंचे हिंदूवादी नेता
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय से पहले गुरुवार सुबह हिंदूवादी नेता श्रीकृष्ण जन्मस्थान पहुंचे. यहां उन्होंने मुख्य द्वार पर पहुंच कर भगवान श्रीकृष्ण की जय जयकार की. हिंदूवादी नेता दिनेश शर्मा ने जन्मस्थान के मेन गेट के सामने बैठकर भगवान से पक्ष में निर्णय आन की प्रार्थना की.
हिंदू पक्ष बोला- नियमों के विरुद्ध शाही ईदगाह कमेटी को जमीन दी गई
हिंदू पक्ष की तरफ से दाखिल 18 याचिकाओं को शाही ईदगाह कमेटी के वकीलों ने उच्च न्यायालय में ऑर्डर 7, रूल 11 के अनुसार चुनौती दी. शाही ईदगाह कमेटी के वकीलों ने बहस के दौरान कहा- मथुरा न्यायालय में दाखिल याचिका सुनवाई योग्य नहीं है. मुद्दा पूजा स्थल अधिनियम 1991 और वक्फ एक्ट के साथ लिमिटेशन एक्ट से बाधित है. इसलिए इस मुद्दे में कोई भी याचिका न तो दाखिल की जा सकती है और न ही उसे सुना जा सकता है.
हिंदू पक्ष की तरफ से बोला गया- इस मुद्दे पर न तो पूजा स्थल अधिनियम का कानून और न ही वक्फ बोर्ड कानून लागू होता है. शाही ईदगाह परिसर जिस स्थान उपस्थित है वह श्रीकृष्ण जन्मभूमि की जमीन है. समझौते के अनुसार मंदिर की जमीन को शाही ईदगाह कमेटी को दी गई है, जो नियमों के विरुद्ध है.
ईदगाह मस्जिद वर्ष 1670 में औरगंजेब ने बनवाई थी. हिंदू पक्ष का दावा है कि मस्जिद को श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर बनाया गया है. इसे वहां से हटाने की मांग की है.
हिंदू पक्षकारों के तर्क
- ढाई एकड़ में बना शाही ईदगाह कोई मस्जिद नहीं है.
- ईदगाह में सिर्फ़ वर्ष भर में 2 बार नमाज पढ़ी जाती है.
- ईदगाह का पूरा ढाई एकड़ का एरिया भगवान कृष्ण का गर्भगृह है.
- सियासी षड्यंत्र के अनुसार ईदगाह का निर्माण कराया गया था.
- प्रतिवादी के पास कोई ऐसा रिकॉर्ड नहीं है.
- सीपीसी के आदेश-7, नियम-11 इस याचिका में लागू नहीं होता है.
- मंदिर तोड़कर मस्जिद का गैरकानूनी निर्माण किया गया है.
- जमीन का स्वामित्व कटरा केशव देव का है.
- बिना स्वामित्व अधिकार के वक्फ बोर्ड ने बिना किसी वैध प्रक्रिया के वक्फ संपत्ति घोषित कर दी.
- भवन पुरातत्व विभाग से संरक्षित घोषित है.
- एएसआई ने नजूल भूमि माना है. इसे वक्फ संपत्ति नहीं कह सकते.
मुस्लिम पक्षकारों की दलीलें
- समझौता 1968 का है. 60 वर्ष बाद समझौते को गलत बताना ठीक नहीं. केस चलने लायक नहीं.
- प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 के अनुसार केस आगे ले जाने के योग्य नहीं है.
- 15 अगस्त 1947 वाले नियम के अनुसार जो धार्मिक स्थल जैसा है वैसा रहे, उसकी प्रकृति नहीं बदल सकते.
- लिमिटेशन एक्ट, वक्फ अधिनियम के अनुसार इस मुद्दे को देखा जाए.
- वक्फ ट्रिब्युनल में सुनवाई हो, यह सिविल न्यायालय में सुना जाने वाला मुद्दा नहीं.
पिछली सुनवाई में क्या हुआ था
30 मई को 5 घंटे तक सुनवाई चली. इस दौरान शाही ईदगाह कमेटी के वकीलों ने उच्च न्यायालय में अपना पक्ष रखा. वकीलों ने मांग की कि मथुरा न्यायालय में दाखिल वाद को खारिज किया जाए. मुद्दा सुनवाई योग्य नहीं है. हिंदू पक्षकारों के वकीलों ने इसका विरोध किया.
हिंदू पक्ष ने कई याचिका पर बहस पूरी की थी
30 मई को हुई सुनवाई में हिंदू पक्ष ने अपनी बहस पूरी की थी. इसके बाद आज मुसलमान पक्ष ने अपनी दलील पेश की. अभी तक की सुनवाई में हिंदू पक्ष मुद्दे को राम जन्मभूमि की तर्ज कर सुनवाई आगे बढ़ाने की मांग कर रहा है. जबकि मुसलमान पक्षकारों का बोलना है कि मुद्दे में आगे की सुनवाई न हो. मुसलमान पक्ष मुकदमे की पोषणीयता, प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट 1991, लिमिटेशन एक्ट, वक्फ अधिनियम आदि बिंदुओं पर अपनी बात रखी.

