पीलीभीत में तमाम प्राचीन धरोहर मौजूद होने के बावजूद है बदहाल
पीलीभीत। जिस तरह बीते सालों में गवर्नमेंट की ओर से पीलीभीत की प्राकृतिक सम्पदा को सहेज कर यहां का नाम राष्ट्र दुनिया के नक्श पर दर्ज कराया गया है। ठीक उसी तरह यदि ऐतिहासिक धरोहरों पर भी ध्यान दिया जाए तो पीलीभीत में पर्यटन नयी ऊंचाईयों को छू लेगा। पीलीभीत की तमाम ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर सालों से संरक्षण की आस में है। इनमें से एक है शाहगढ़ का प्राचीन टीला जिसे राज वेणु का क़िला भी बोला जाता है।

दरअसल पीलीभीत में तमाम प्राचीन धरोहर उपस्थित हैं लेकिन दुर्भाग्य है कि सब बदहाल हैं। लेकिन बीते साल सामाजिक कार्यकर्ता के प्रयासों के चलते शाहगढ़ में उपस्थित टीले का राज्य पुरातत्व सर्वेक्षण की टीम ने ग्राउंड सर्वे किया था। सर्वे टीम ने याहाई भी माना कि यह टीला काफी अधिक प्राचीन है। पीलीभीत के शाहगढ़ क्षेत्र में महाभारत काल के समकालीन शासक राजा वेणु का किला हुआ करता था। इस किले के शाहगढ़ में उपस्थित होने की पुष्टि ब्रिटिशकालीन हिंदुस्तान के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के प्रथम निदेशक एलेक्जेंडर कनिंघम ने सन 1862,1863,1864 में प्रकाशित अपनी सर्वे रिपोर्ट में भी किया था।
पीलीभीत में तमाम प्राचीन धरोहर मौजूद
यह जरूरी विरासत भी अनदेखी का शिकार हो रहा थी। आलम यह है कि और पुरातात्विक महत्व रखने वाले इस टीले की ज़मीनों पर खेती की जा रही है। बावजूद इसके इस इमारत के संरक्षण की फाइलें एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय के बीच फुटबॉल बनी हुई है। शाहगढ़ से पहले भी तमाम धरोहरों को भारतीय पुरातत्व और राज्य पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संरक्षित किया है। संरक्षित धरोहरों में शामिल इमारतों में सबसे पहली इमारत जामा मस्जिद है। शहर में स्थित जामा मस्जिद को साल 1965 में संरक्षित सूची में शामिल किया गया था। इसके अतिरिक्त शहर का गौरीशंकर मंदिर, इलाबांस देवल मंदिर, बरेली और कोतवाली दरवाजा शामिल है।

