उत्तर प्रदेश

शिक्षा सेवा चयन बोर्ड अध्यक्ष का इस्तीफा, सपा ने घेरा- पूरे कार्यकाल में सिर्फ़ एक ही परीक्षा क्यों…

उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग की अध्यक्ष ने शुक्रवार को अपने पद से त्याग-पत्र दे दिया. इसको लेकर अब राजनीति गरमा गई है. उन्होंने पिछले एक वर्ष पहले अध्यक्ष पद का कार्यभार संभाला था. आयोग के गठन के बाद से अब तक एक भी भर्ती पूरी नहीं हो सकी. इस कदम ने एक बार फिर प्रदेश की भर्ती प्रक्रिया और बेरोजगार युवाओं के भविष्य पर प्रश्न खड़े कर दिए हैं.

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प्रदेश के प्रमुख विपक्षी दल सपा ने इस्तीफे पर राजनीति प्रारम्भ कर दी है. समाजवादी पार्टी एमएलसी मान सिंह यादव ने बोला कि बोर्ड अध्यक्ष गवर्नमेंट के दबाव में काम नहीं कर पा रही थीं. बेरोजगार युवाओं की बढ़ती भीड़ से उन्हें आत्मबोध होने लगा था, जिसके चलते उन्होंने अपने पद से त्याग-पत्र दिया.

सपा विधायक ने इसे बीजेपी गवर्नमेंट की “विफलता” करार देते हुए तीखा धावा बोला. उनका बोलना है कि आयोग का गठन तो प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च, तकनीकी और अल्पसंख्यक सभी शिक्षकों की भर्ती एक ही छतरी के नीचे करने के लिए हुआ था, लेकिन हकीकत में तीन वर्ष बीतने के बाद भी एक भी वैकेंसी नहीं निकली.

सवाल: आप इस्तीफे को किस नजरिए से देखते हैं?

जवाब: यह सीधे-सीधे बेरोजगारों के साथ छलावा है. जब भिन्न-भिन्न बोर्ड रहते हुए काम पूरा नहीं हो पा रहा था तो सारे बोर्डों को मिलाकर आयोग बना दिया गया. लेकिन आठ वर्ष बाद भी एक भी भर्ती नहीं हुई. अब अध्यक्ष को भी लग गया कि यह उनके बस की बात नहीं है, इसलिए उन्होंने पद छोड़ना ही उचित समझा.

सवाल: क्या यह त्याग-पत्र नैतिक आधार पर है या गवर्नमेंट के दबाव में दिया गया है?

जवाब: यह तो उनकी अंतरात्मा ही जानें. लेकिन इतना तय है कि लोकतंत्र में आयोग और बोर्ड का गठन बेरोजगारों को रोजगार देने के लिए किया जाता है. जब भर्ती ही नहीं हो रही तो पद पर बने रहने का क्या औचित्य? अध्यक्ष का त्याग-पत्र इस गवर्नमेंट की नाकामी को उजागर करता है.

सवाल: विपक्ष इसे बीजेपी गवर्नमेंट की विफलता क्यों बता रहा है?

जवाब: बीजेपी की नीयत ही साफ नहीं है. गवर्नमेंट चाहती ही नहीं कि बेरोजगारों को जॉब मिले. या तो भर्तियों को पेपर लीक करवा कर उलझा दिया जाता है, या आरक्षण में गड़बड़ी कर दी जाती है. 69000 शिक्षक भर्ती इसका उदाहरण है.

सवाल: क्या आठ वर्ष का समय भर्ती प्रक्रिया पूरी करने के लिए काफी था?

जवाब: बिल्कुल. आठ वर्ष कम समय नहीं होता. इतने लंबे समय में आयोग से आठ नहीं तो कम से कम कुछ भर्ती तो होनी चाहिए थी. लेकिन यहां एक भी वैकेंसी नहीं निकली. असिस्टेंट प्रोफेसर की भर्ती का साक्षात्कार प्रारम्भ होने से पहले ही अध्यक्ष का त्याग-पत्र आ गया. यह बेरोजगारों के लिए सबसे बड़ा झटका है.

सवाल: भविष्य में विपक्ष की क्या रणनीति रहेगी?

जवाब: सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने साफ बोला है कि सत्ता में आने पर हम सभी अधूरी भर्तियां पूरी करेंगे. आउटसोर्सिंग, संविदा, ठेका प्रथा और अग्निवीर जैसी व्यवस्थाओं को समाप्त किया जाएगा. बेरोजगार युवाओं को स्थायी जॉब देना ही हमारी अहमियत है. समाजवादी पार्टी विधायक मौजूदा समय में एमएलसी चुनाव को लेकर प्रयागराज-झांसी शिक्षा क्षेत्र में मतदाताओं के बीच पसीना बहा रहे हैं.

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