Mahakumbh 2025: जानें, क्यों अब तक मान्यता से दूर है किन्नर अखाड़े…
Prayagraj Mahakumbh 2025 Kinnar Akhada: संगम नगरी प्रयागराज में जल्द ही महाकुंभ का आयोजन होने जा रहा है. 13 जनवरी से 26 फरवरी तक प्रयागराज में धर्म का महापर्व मनाया जाएगा. करोड़ों श्रद्धालुओं के अतिरिक्त राष्ट्र के प्रसिद्ध अखाड़े भी त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाएंगे. मगर क्या आप जानते हैं कि इस बार एक नया अखाड़ा भी महाकुंभ में शिरकत करता नजर आएगा. हम बात कर रहे हैं ‘किन्नर अखाड़ा’ की. किन्नर अखाड़े को बने 9 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन इसे अभी तक अलग अखाड़े की मान्यता नहीं मिली है. तो आइए जानते हैं इस अखाड़े के बारे में विस्तार से…

कब प्रारम्भ हुआ किन्नर अखाड़ा?
2014 में उच्चतम न्यायालय ने नालसा जजमेंट सुनाते हुए अनुच्छेद 377 को रद्द कर दिया था. इसी के साथ राष्ट्र में समलैंगिगता को भी मान्यता मिल गई थी. 2015 में प्रसिद्ध एक्टिविस्ट लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने किन्नर अखाड़े की नींव रखी. किन्नर अखाड़ा 2016 में उज्जैन के सिंहस्थ में शामिल हुआ. 2019 में प्रयागराज अर्धकुंभ में भी किन्नर अखाड़े ने शिरकत की.
क्यों नहीं मिली मान्यता?
किन्नर अखाड़े को जूना अखाड़े का हिस्सा माना जाता है. इसे अस्तित्व में आए 9 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन किन्नर अखाड़े को अभी तक मान्यता नहीं मिली है. इसकी सबसे बड़ी वजह है अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद (ABAP). दरअसल ABAP सभी 13 अखाड़ों का मुख्य संगठन है और ये किन्नर अखाड़े को अलग मान्यता देने के कठोर विरुद्ध है.
2019 के अर्धकुंभ में निकली पेशवाई
ABAP ने किन्नर अखाड़े के प्रयाग अर्धकुंभ में आने पर भी विरोध जताई थी. ऐसे में किन्नर अखाड़े ने स्वयं को उपदेव बताते हुए 2019 के प्रयाग अर्धकुंभ में धूमधाम से एंट्री की थी. इसे देवत्व यात्रा यानी पेशवाई बोला गया था. इस यात्रा में किन्नर अखाड़े के महामंडलेश्वर स्वामी लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी, पीठाधीश्वर प्रभारी उज्जैन की पवित्रा माई, उत्तर हिंदुस्तान की महामंडलेश्वर भवानी मां और महामंडलेश्वर चिकित्सक राजेश्वरी ने भी शिरकत की थी.
रामायण-महाभारत में मिला जिक्र
भारत और खासकर हिंदू धर्म में किन्नर समुदाय का हमेशा से खास महत्व रहा है. रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों में भी किन्नरों का जिक्र मिलता है. रामायण में भगवान राम के जन्म के बाद किन्नरों को आशीर्वाद देने के लिए बुलाया गया था. वहीं राम वनवास गए तो किन्नरों ने भी जंगल में 14 वर्ष बिताए और भगवान राम के साथ ही अयोध्या वापस लौटे थे. इसके अतिरिक्त महाभारत में शिखंडनी भी किन्नर थीं, जो भीष्म पितामह की मृत्यु की वजह बनी थीं.
मुगलों ने दी खास तवज्जो
हिंदू धर्म के अतिरिक्त इस्लाम धर्म में भी किन्नरों को खास तवज्जो प्राप्त थी. किन्नर मुगलों के हरम में बेगमों के बहुत खास होते थे. वहीं मुगल सेना से लेकर दरबार में नृत्य करने तक की जिम्मेदारी किन्नरों पर होती थी. मुगलकाल की पुस्तकों में किन्नरों के लिए ‘हिजड़ा’
कैसे कम हुई किन्नरों की साख?
हालांकि ब्रिटिश हुकूमत किन्नरों के लिए डार्क फेज बनकर सामने आया, जिसका दंश वो आज भी झेल रहे हैं. 200 वर्ष के राज में अंग्रेज किन्नरों को काफी हीन भावना से देखने लगे. अंग्रेजों के मुताबिक किन्नर गंदगी, रोग और संक्रमण फैलाने वाला समुदाय था. 1864 में उन्होंने ब्रिटेन का बुगेरी एक्ट हिंदुस्तान में लागू कर दिया, जिसके बाद से समलैंगिगता को क्राइम माना जाने लगा था. संविधान का अनुच्छेद 377 भी इसी कानून की देन था, जिसे उच्चतम न्यायालय ने 2014 में रद्द कर दिया था.

