तलाक लिए बिना किसी के साथ नहीं रह सकती विवाहिता, लिव इन पर हाईकोर्ट का अहम फैसला
उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए बोला कि धर्मांतरण विरोधी कानून लिव-इन रिलेशनशिप पर भी लागू होता है। न्यायधीश ने बोला कि कोई जोड़ा लिव इन में रह रहा है तो भी उसपर यूपी अवैध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 लागू होगा। न्यायालय ने ये टिप्पणी लिव इन में साथ रह रहे एक हिंदू-मुस्लिम जोड़े के लिए की। न्यायधीश रेणु अग्रवाल ने जोड़े की याचिका खारिज करते हुए उन्हें सुरक्षा देने से इनकार किया। बता दें कि इसी वर्ष जोड़े ने आर्य समाज के रीति-रिवाजों के मुताबिक विवाह की थी और न्यायालय में उत्पीड़न से सुरक्षा की मांग की थी।

याचिकाकर्ताओं में 24 वर्षीय मुसलमान स्त्री और 23 वर्षीय हिंदू पुरुष हैं। दोनों ने आर्य समाज के मुताबिक विवाह की। याचिकाकर्ताओं ने अपना धर्म नहीं बदला था। जोड़े ने न्यायालय में किसी भी उत्पीड़न के विरुद्ध सुरक्षा की मांग की थी। न्यायालय ने उन्हें लिव इन जोड़ा बताते हुए निर्देश दिए कि कानून के मुताबिक पंजीकरण प्रक्रिया पूरी करें। इस पर जोड़े ने कहा कि उनकी विवाह पंजीकरण की ई-एप्लीकेशन अभी लंबित है इस कारण वो अपनी जिंदगियों के लिए सुरक्षा की गुहार लगा रहे हैं।
जज ने जोड़े को सुरक्षा देने से इनकार करते हुए टिप्पणी की कि परिवारों की ओर से कोई कम्पलेन दर्ज नहीं की गई है। साथ ही उनके संबंध को भी चुनौती नहीं दी गई है। इसी कारण धर्मांतरण विरोधी कानून का पालन न करने के चलते उनकी सुरक्षा की याचिका खारिज की गई है। वहीं राज्य ने भी न्यायालय में जोड़े के विरोध में बोला था कि उन्होंने धर्मांतरण के लिए कभी भी आवेदन नहीं दिया। दरअसल, हिंदू शादी अधिनियम, 1955 के अनुसार कोई मुसलमान स्त्री हिंदू पुरुष से आर्य समाज रीति-रिवाजों के मुताबिक विवाह नहीं कर सकती है।
इसी के आधार पर न्यायालय ने उनके संबंध को लिव-इन बताते हुए बोला कि अंतरधार्मिक जोड़ों के लिए धर्मांतरण विरोधी कानून के मुताबिक धर्मांतरण के लिए आवेदन करना जरूरी है। न्यायधीश ने बोला कि धर्म बदलाव का पंजीकरण न सिर्फ़ शादी के उद्देश्य के लिए बल्कि शादी की प्रकृति में संबंधों के लिए भी महत्वपूर्ण है।

