दो अध्यक्षों के विवाद के कारण प्रदीप को मिला कार्यभार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में बीजेपी संगठन ने एक बार फिर महानगर अध्यक्ष के पद पर प्रदीप अग्रहरि की ताजपोशी कर दी है. महानगर अध्यक्ष पद के लिए 78 से अधिक लोगों ने आवेदन किए थे. दावेदारों की लंबी फौज के चलते संगठन भी पशोपेश में

वाजपेई और जोशी की नोंकझोंक ने दिलाई अध्यक्ष की कुर्सी
नरेंद्र मोदी ने वाराणसी से पहली बार साल 2014 में सांसद का चुनाव लड़ा था. उस समय वाराणसी के सांसद वरिष्ठ बीजेपी नेता चिकित्सक मुरली मनोहर जोशी थे. महानगर अध्यक्ष के पद पर तुलसी जोशी थे. मोदी के इलेक्शन कैंपेन के दौरान यूपी के तत्कालीन बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष से बहस हो गई थी. संगठन ने इसे अनुशासनहीनता माना था. 2014 में तुलसी जोशी की टीम में प्रदीप अग्रहरि महानगर महामंत्री की किरदार में थे. चुनाव होने के बाद जोशी को शीर्ष नेतृत्व ने पद से हटा दिया. काशी के प्रमुख व्यापारिक केंद्र होने के कारण संगठन व्यवसायी चेहरा सामने लाना चाहती थी. प्रदीप अग्रहरि की पार्टी में सक्रियता और पिछले रिकॉर्ड को ध्यान में रखते हुए उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया गया. कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर प्रदीप अग्रहरि संगठन के पैमाने पर खरे उतरे और इसका रिज़ल्ट यह हुआ कि आज उन्हें तीसरी बार महानगर अध्यक्ष की कुर्सी थमाई गई है.
अटल युग में पिता, मोदी राज में बेटे को मिली कुर्सी
देश के पूर्व पीएम हिंदुस्तान रत्न अटल बिहारी के दौर में प्रदीप अग्रहरि के पिता स्वर्गीय रामसुमेर अग्रहरि वाराणसी महानगर के अध्यक्ष थे. कंस्ट्रक्शन मैटेरियल से संबंधित कारोबार से जुड़े प्रदीप अग्रहरि को पहली बार महानगर अध्यक्ष की कुर्सी 2014 में मिली थी. उसके बाद 2016 से 2019 तक महानगर अध्यक्ष के तौर संगठन की जिम्मेदारी संभाली. उनके कार्यकाल में पीएम मोदी ने वाराणसी से चुनाव लड़ा और बंपर वोट से जीत हासिल की.
तीन विधानसभा की जिम्मेदारी, व्यवसायी समाज पर अच्छी पकड़
वाराणसी महानगर में तीन विधानसभा कैंट, उत्तरी, दक्षिणी के साथ रोहनिया विस का आंशिक हिस्सा वाराणसी बीजेपी महानगर में आता है. इन तीनों विधानसभाओं में वैश्य समुदाय की अच्छी खासी संख्या (लगभग दो लाख) है. प्रदीप अग्रहरि का पिछला कार्यकाल भी निर्विवाद रहा. संगठन पर मजबूत पकड़ के साथ ही प्रदीप को बीजेपी के राष्ट्रीय महामंत्री सुनील बंसल का भी करीबी माना जाता है.
भूमिहार समाज जोड़ने के लिए लाए गए थे विद्यासागर
निवर्तमान महानगर अध्यक्ष विद्यासागर राय सामान्य वर्ग से आते हैं. भूमिहार समाज को जोड़ने के लिए संगठन ने विद्यासागर को 2019 में महानगर अध्यक्ष बनाया था. सियासी गलियारों में चर्चा थी कि उत्तर प्रदेश कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष अजय राय जो वाराणसी के ही निवासी हैं, की काट के लिए बीजेपी ने विद्यासागर राय को महानगर अध्यक्ष बनाया था. विद्यासागर नियमानुसार लगातार दो बार का कार्यकाल पूरा कर चुके थे. बात की जाए भूमिहार समाज के अगुवाई की तो बीजेपी ने पत्रकारिता से राजनीति की दुनिया में प्रवेश करने वाले धमेंद्र राय को एमएलसी बनाकर पूरा कर चुकी है.
भीतरघात का था खतरा, कामकाज पर पड़ता असर
शीर्ष नेतृत्व फिलहाल वाराणसी में कोई ऐसा चेहरा सामने नहीं लाना चाहती थी जिसके चलते विरोध के स्वर उठे और विपक्षियों को प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी को घेरने का मौका मिले क्योंकि वाराणसी उनका संसदीय क्षेत्र है. मंत्री, विधायक से लेकर तमाम बड़े नेता अपने खास को महानगर की कुर्सी दिलाने के लिए बल आजमाइश कर रहे थे. लखनऊ से लेकर दिल्ली तक दौड़ चल रही थी. 78 से अधिक आवेदन आए थे महानगर की कुर्सी के लिए. एक के हाथ कुर्सी आती और 77 नाराज होते. किसी एक खेमे का चेहरा लेने पर दूसरा खेमा नाराज हो जाता जिसका असर संगठन के कामकाज के साथ 2027 में होने वाले चुनाव पर पड़ता. ऐसे में शीर्ष नेतृत्व ने प्रदीप अग्रहरि पर फिर से दांव खेल दिया. प्रदीप अग्रहरि का पिछला कार्यकाल बहुत बढ़िया रहा.

