बार-बार टिकट बदलने से अपने ही चक्रव्यूह में फंसती दिख रही है सपा
चुनाव प्रचार से दूर अभी टिकट वितरण में उलझी समाजवादी पार्टी अब अपने ही चक्रव्यूह में फंसती दिख रही है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जिस तरह बार-बार प्रत्याशी बदलने का सिलसिला चल रहा है, उससे पार्टी के लिए नयी मुश्किलें खड़ी हो गईं. जिनका टिकट कट गया है, उन्हें अपने समर्थकों को समझाना कठिन हो रहा है. ऐसे मायूस नेताओं को समझा कर उन्हें प्रचार में लगाना और उत्साहित करना समाजवादी पार्टी के लिए अब नयी चुनौती आ खड़ी हुई है. वैसे पार्टी टिकटों में परिवर्तन को मजबूत प्रत्याशी की तलाश का आधार बता रही है.

यह नयी कठिन ऐसे समय में आई है, जब चुनाव का पहला चरण 19 अप्रैल से प्रारम्भ हो रहा है और पार्टी का मुकम्मल प्रचार अभियान प्रारम्भ नहीं हो पाया है. अखिलेश यादव के चुनावी दौरे, चुनावी घोषणा पत्र, कांग्रेस पार्टी के साथ संयुक्त रैलियां आदि अभियान टिकट वितरण में इस तरह के खेल से प्रभावित हो सकते हैं.
मेरठ में एक महीने में तीन टिकट
हालत यह है कि समाजवादी पार्टी में कब किसका टिकट कट जाए, कट कर दुबारा मिल जाए और फिर टिकट कट जाए. कोई पक्की तौर पर नहीं कर सकता. ताजा उदाहरण तो मेरठ का है. जहां महीने में तीन बार टिकट बदला जा चुका है. समाजवादी पार्टी में इस स्थिति पर पार्टी के लोग हैरत में हैं तो बीजेपी और रालोद समाजवादी पार्टी पर इस मामले पर तंज कसने में पीछे नहीं है. अखिलेश यादव जब उम्मीदवार के नाम का घोषणा करते हैं लेकिन क्षेत्रीय नेता उन पर टिकट बदलने का दबाव बनाने लगते हैं. कभी बाहरी के नाम पर तो कभी जातीय समीकरण फिट न होने के नाम पर अखिलेश यादव अपना फैसला बार-बार बदल रहे हैं.
मुरादाबाद, रामपुर और मेरठ में इस तरह हुआ खेल
मुरादाबाद में एसटी हसन को भी टिकट देने का फैसला हो चुका था लेकिन फिर भी रुचिवीरा प्रत्याशी हो गईं. मौजूदा सांसद एसटी हसन कहते हैं अब क्या किया जा सकता है. मुरादाबाद में नाटकीय और रोचक घटनाक्रम के बाद अब मेरठ में नया खेल हो गया. पहले सामान्य सीट पर पार्टी ने दलित प्रत्याशी भानु प्रताप को उतार दिया लेकिन यहां के टिकट के लिए तीन विधायक अतुल प्रधान, रफीक अंसारी और शाहिद मंजूर भी रेस में थे. बाजी हाथ लगी अतुल प्रधान के, जो अपना टिकट पक्का कराने के लिए अखिलेश के पीछे पीछे दिल्ली पहुंच गए. अखिलेश यादव से उन्होंने अपना टिकट पक्का करा लिया और नामांकन करा दिया लेकिन फिर बाजी पलटी और बाजी हाथ लगी सुनीता वर्मा के. टिकट कटने के बाद अतुल प्रधान भी मायूस दिखे लेकिन उन्होंने मीडिया से बोला कि वह पार्टी के प्रचार में पूरी तरह लगेंगे.
रामपुर में आजम गुट के बगावती तेवर
रामपुर में पहले से आजम खां गुट के तेवर बगावती हैं. आजम खां के खास आसिम रजा ने भी नामांकन कर दिया लेकिन अखिलेश ने कठोर तेवर दिखाए और समाजवादी पार्टी के वह अधिकृत प्रत्याशी नहीं बन सके. अब वह कितना योगदान नए प्रत्याशी के लिए कर रहे हैं, यह रामपुर में साफ दिख रहा है.
अब तक नौ सीटों पर बदल चुके हैं प्रत्याशी
बागपत, संभल, मिश्रिख, बदायूं, बिजनौर, मुरादाबाद, गौतमबुद्ध नगर, मुरादाबाद, मेरठ में टिकट बदले जा चुके हैं. अध्यक्ष अखिलेश यादव अब तक मुरादाबाद, रामपुर, बागपत, मेरठ, बिजनौर, गौतमबुद्ध नगर, बदायूं और मिश्रिख सीट से उम्मीदवार बदल चुके हैं. अभी और भी कई सीटों पर प्रत्याशी बदले जाने की तैयारी है. बताया जा रहा है कि घोसी में घोषित प्रत्याशी राजीव राय की स्थान दूसरे पर दांव लगाया जा सकता है.
2017 में बार टिकट बदलने से भी हुआ समाजवादी पार्टी को नुकसान
2017 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी में पहले से आंतरिक घमासान मचा था. ऐेसे समाजवादी पार्टी की कमान अपने हाथ में लेने और कांग्रेस पार्टी के साथ गठजोड़ करने के बाद अखिलेश यादव ने उस समय कई प्रत्याशियों को बदल दिया. इससे दोहरा हानि हुआ. एक तो जिसे ऐन समय पर टिकट दिया गया वह समय की कमी के चलते पूरी शिद्दत से प्रचार में नहीं लग पाया और जिसका टिकट कटा उसके समर्थक मायूस होकर घर बैठ गए. उस चुनाव में समाजवादी पार्टी के सत्ता से बाहर होने और 224 से 47 सीटों पर पहुंचने की अनेक वजहों में एक बड़ा कारण यह भी रहा.

