उत्तर प्रदेश

लखनऊ से रवाना हुआ चुप ताजिया जुलूस, इमाम हुसैन को याद करके भर आईं आंखें

लखनऊ में सोमवार को चौक स्थित इमाम बाड़ा नाजिम साहब से चुप ताजिया का जुलूस निकाला गया. ये जुलूस मोहर्रम के अंतिम दिन निकलने वाला आखिरी जुलूस होता है. दो महीने 8 दिन तक चलने वाले मोहर्रम और गम के सिलसिले का चुप ताजिया के साथ समाप्ति हुआ. ईराक स्थित कर्बल

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3 किलोमीटर पैदल चले अकीदतमंद

जुलूस प्रारम्भ होने से पहले शिया धर्म गुरु मौलाना एजाज़ अतहर ने मजलिस पढ़ी. उसके बाद परंपरागत ढंग से निकाला गया जुलूस अकबरीगेट, नख्खास, बिल्लौचपुरा चैराहे से मुड़कर गिरधारी सिंह इंटर कॉलेज मंसूर नगर होता हुआ सआदतगंज स्थित रौजा-ए-काजमैन में संपन्न हो गया. लगभग 3 किलोमीटर पैदल यात्रा अकीदतमंदों ने तय किया. जुलूस और मजलिस में बड़ी संख्या में अकीदत मंद शामिल हुए और नम आंखों से हजरत इमाम हुसैन को याद किया.

2 महीना 8 दिनों तक मनाया सोग

मौलाना एजाज़ अतहर ने जंग की तारीख बयान किया. उन्होंने बोला कि इराक के कर्बला जैसी जंग दुनिया में दोबारा कभी नहीं हुई. यह ऐसी जंग थी, जिसमें महिलाएं , बीमार और 6 महीने के मासूम बच्चे भी शामिल हुए. पैगंबर मोहम्मद साहब के नवासे ने इस जंग को मानवता कि खातिर लड़ी थी. जिसके साथ कर्बला से ये संदेश दिया कि अत्याचार करने वाला कितना भी ताकतवर शाली हो उसके विरुद्ध आवाज ज़रूर उठाना चाहिए . 2 महीना 8 दिन तक हमने लगातार जुलूस और मजलिस के माध्यम से हजरत इमाम हुसैन को याद किया. आज मोहर्रम के गम का अंतिम दिन है.

मोहर्रम के सभी जुलूस खास

मोहर्रम में निकलने वाले सभी जुलूस खास होते हैं. लखनऊ इमामबाड़ा से निकाले गए अलविदाई चुप जुलूस मे भारी संख्या मे अकीदतमंद, अजादार शामिल हुए. मरसिया पढ़कर अकीदतमंदों ने इमाम हुसैन और उनके साथियों याद किया, पुरसा पेश किया . जुलूस में शामिल ताजिया को अकीदत के साथ लोग चूमते हुए नजर आए.

मोहर्रम में नहीं करते कोई खुशी का काम

जुलूस में शामिल अकीदतमंद तबरेज़ ने बोला कि आज हम लोग नम आंखों के साथ मोहर्रम को विदा कर रहे हैं. 2 महीना 8 दिन शिया समुदाय के लिए बहुत विशेष होता है. मोहर्रम का वर्ष भर इंतिजार रहता है. इन दिनों में हम ज्यादातर काले कपड़े पहनते हैं. किसी प्रकार की खुशी नहीं मनाई जाती है. हमारी ये प्रयास होती है कर्बला के मैदान से इमाम हुसैन ने जो संदेश दिया उसे अपने जीवन में लागू करें. इमाम हुसैन और उनके साथियों को 3 दिनों तक भूखा-प्यासा रखा गया था. इसलिए मोहर्रम के दौरान बड़ी संख्या में भंडारा बांटा जाता है. सबील (प्याऊ) लगाई जाती है.

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