वॉटर वुमन शिप्रा पाठक ने बांधे सीएम योगी की तारीफ़ों के पुल
वाटर वुमेन ऑफ इण्डिया के नाम से प्रख्यात शिप्रा पाठक महाकुंभ में त्रिवेणी संगम की स्वच्छता और अविरलता देखकर अभिभूत नजर आ रही हैं. उन्होंने इसके लिए मुख्यमंत्री योगी का आभार जताया है. महाकुंभ में जल और पर्यावरण संरक्षण के लिए एक थैला, एक थाली अभियान में जुटीं शिप्रा ने कहा, “संगम समेत पूरे महाकुंभ में स्वच्छता का जो दृश्य दिख रहा है वो अद्भुत है.
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यह सुंदर प्रबंध एक ऐसे आदमी ने की है जो मुख्यमंत्री होने के साथ-साथ एक साधक हैं, योगी हैं, संन्यासी है. कुम्भ उनके दिल के बहुत निकट है. इसलिए कुम्भ की उनसे बेहतर प्रबंध कोई और नहीं कर सकता.” अभियान के अनुसार अब तक विभिन्न संस्थाओं के योगदान से महाकुंभ में लाखों थैले और थालियों का वितरण किया जा चुका है.
सीएम योगी के सुशासन को पूरे राष्ट्र में मिल रही पहचान मुख्यमंत्री योगी को शिप्रा ने सबसे लोकप्रिय सीएम करार देते हुए कहा- पूरे राष्ट्र में उनके सुशासन की चर्चा हो रही है. उन्होंने कहा, “कुम्भ से अलग भी उदाहरण दूं तो पिछले साल नवंबर में अयोध्या से रामेश्वरम पैदल गई थी.
जब हमने कर्नाटक में लोगों को कहा कि मैं अयोध्या से, राम के घर से आई हूं तो उनकी प्रतिक्रिया थी कि योगी वाला उत्तर प्रदेश. यदि कर्नाटक के एक छोटे से गांव में हिंदुस्तान के सबसे बड़े प्रदेश की पहचान योगी जी के नाम से हो रही है तो इसका मतलब है कि महाराज जी की सेवा, संकल्प और सिद्धांत को कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक मान्यता मिल रही है.
संस्कृति विलुप्त हुई तो दूसरा महाकुंभ नदी किनारे नहीं हो पाएगा वॉटर विमेन शिप्रा पाठक जल एवं पर्यावरण संरक्षण को लेकर अब तक 13,000 किलोमीटर की पदयात्राएं कर चुकी हैं. उनकी संस्था पंचतत्व से 15 लाख लोग जुड़े हैं, जिनके योगदान से नदियों के किनारे 25 लाख पौधे लगाए गए हैं. यहां महाकुम्भ में भी वह स्वच्छता की अलख जगाने के लिए एक थैला, एक थाली अभियान में एक्टिव भूमिक निभा रही हैं.
उनका बोलना है कि कुम्भ को स्वच्छ बनाने के लिए हमने पहले ही अखाड़ों में जाकर थैला, थालियां, गिलास, चम्मच बांट दिए. किसी श्रद्धालु के हाथ में पन्नी दिखी तो उसको भी थैला दे दिया. उन्होंने बोला कि हमें अपनी संस्कृतियों को जीवित रखते हुए नदी को बचाना है. नदियों को कमर्शियलाइज करके, मशीन डालकर साफ कर सकते हो, लेकिन संस्कृति यदि एक बार विलुप्त हो गई तो दूसरा महाकुंभ नदी किनारे नहीं हो पाएगा.
निर्मल, अविरल जल के लिए एक साल से कर रहीं प्रयास अपना कारोबार और जॉब छोड़कर नदियों और जंगलों को बचाने का संकल्प लेने वाली शिप्रा ने महाकुंभ के महात्म्य को लेकर बोला कि यह साधारण उत्सव या अवसर नहीं है. संगम त्रिवेणी पर हर वर्ग, हर तबके, हर विचार के लोग डुबकी लगाते हैं तो वहां का स्पंदन कुछ अलग ही होता है. यहां पर डुबकी लगाना ही मेरा प्रकल्प नहीं है.
मेरे पहले और मेरे बाद जो लोग भी यहां डुबकी लगाएं, उन्हें निर्मल, अविरल जल के दर्शन हों इसके लिए हम एक वर्ष से कार्यरत हैं. पर्यावरण संरक्षण गतिविधि के द्वारा हमने 100 संस्थाओं को एकजुट किया है जो हमारा योगदान कर रही हैं.
जहां नदियां स्वच्छ, वहां विकास वाटर विमेन बनने की अपनी कहानी साझा करते हुए वह कहती हैं कि बचपन से ही जल के प्रति मेरा बहुत प्रेम था. माता-पिता ने नाम भी शिप्रा रखा जो एक नदी का नाम है. कंपनी के काम से जब विदेश जाती थी तो देखती थी कि वहां की नदियां कितनी स्वच्छ हैं. वहां तो नदियों को देवी नहीं माना जाता. हमारी नदियां ऐसी क्यों नहीं है.
नर्मदा की परिक्रमा ने मेरा मन बदला. मैंने देखा मां नर्मदा जहां-जहां दूषित है, वहां लोगों का अर्थ भी बिगड़ा हुआ है, स्वास्थ्य भी बिगड़ा हुआ है और जहां वह अविरल बह रही है, वहां विकास दिखाई देता है. यहीं से वैराग्य हुआ. शिप्रा की यात्रा की, गोमती की यात्रा की, फिर अयोध्या से रामेश्वरम तक की यात्रा की.
हमारा उद्देश्य नए हिंदुस्तान की परिकल्पना नहीं, बल्कि प्राचीन हिंदुस्तान को ही जीवित रखना है. हमें आने वाली पीढ़ी को अपनी संस्कृति से अवगत कराना होगा. त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाने से केवल मोक्ष नहीं मिलता है, बल्कि शरीर भी स्वस्थ होता है. एक स्वस्थ शरीर को ही मोक्ष मिल पाएगा.

