श्रीराम मंदिर समारोह में कब किया जाएगा जशोदाबेन को आमंत्रित…
अयोध्या में श्रीराम मंदिर का उद्घाटन कार्यक्रम है, इसके लिए सबसे पहले संतों और राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के कई ऑफिसरों ने पीएम जशोदाबेन से मुलाकात की और मंदिर के उद्घाटन के लिए निमंत्रण दिया। अच्छा किया, लेकिन…।जशोदाबेन को कब आमंत्रित किया जाएगा?

याद रहे, इससे पहले भी श्रीराम मंदिर पूजा में पीएम नरेंद्र मोदी अकेले ही बैठे थे, जबकि सनातन धर्म में किसी भी प्रमुख पूजा में पति और पत्नी, दोनों का मौजूद रहना जरूरी है।
उल्लेखनीय है कि श्रीराम मंदिर का संपूर्ण श्रेय पीएम नरेंद्र मोदी की राजनीतिक झोली में डालने के लिए श्रीराम मंदिर आंदोलन में प्रमुख किरदार निभाने वाले अनेक लोगों को श्रीराम मंदिर कार्यक्रम में दूर रखा गया था, कुछ लोग कभी-कभी लालकृष्ण आडवाणी को याद भी कर लेते हैं। जबकि सुब्रमण्यम स्वामी का बोलना है कि श्रीराम मंदिर निर्माण में प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी का तो कोई सहयोग है ही नहीं, जिन लोगों ने काम किया उनमें राजीव गांधी, पीवी नरसिम्हा राव और अशोक सिंघल के नाम शामिल हैं।
इन सबसे हटकर बलराज मधोक जो जनसंघ के प्रमुख नेता रहे हैं और जिनका नाम अब राजनीतिक स्क्रीन से गायब है, सबसे पहले आदमी थे, जिन्होंने श्रीराम मंदिर को लेकर आवाज बुलंद की थी?
यही नहीं, श्रीराम मंदिर को लेकर न्यायालय ने जो निर्णय दिया है, बलराज मधोक ने कुछ-कुछ ऐसा ही निवारण पेश किया था!
बीबीसी की रिपोर्ट कहती है कि साल 1968 में बलराज मधोक पहले नेता थे जिन्होंने अयोध्या में बाबरी मस्जिद हिंदुओं के हवाले करने की मांग उठाई थी। उसके बदले में उन्होंने हिंदुओं द्वारा मुसलमानों के लिए एक भव्य मस्जिद बनाने की पेशकश की थी?
कुछ लोगों को आज लालकृष्ण आडवाणी के साथ जो राजनीति हुई है, वह रास नहीं आ रही है। लेकिन, ऐसी ही राजनीति बलराज मधोक के साथ भी हुई थी।
जब लालकृष्ण आडवाणी जनसंघ के अध्यक्ष थे और क्या पता, ऐसा ही कुछ नरेंद्र मोदी के साथ भी हो?
एक ज़माने में भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष रहे बलराज मधोक को उनकी पार्टी ने ही साल 1973 के कानपुर अधिवेशन के बाद पार्टी से निष्कासित कर दिया था? और…। इसके बाद से ही उनकी बड़ी राजनीतिक पारी खत्म हो गई।
मजेदार बात यह हैे कि लालकृष्ण आडवाणी को जनसंघ से जोड़ने में भी बलराज मधोक की मुख्य किरदार थी?
श्रीराम मंदिर कार्यक्रम के राजनीतिक लाभ के लिए राजनीतिकरण के प्रश्न उठे तो अच्छी बात है कि संतों ने ठीक राय दी। विश्व हिंदू परिषद सूत्रों का बोलना है कि संगठन को साधु-संतों ने यह सुनिश्चित करने की राय दी है कि श्रीराम मंदिर का उद्घाटन एक गैर-राजनीतिक कार्यक्रम रहे।
विहिप अगले वर्ष 1 जनवरी 2024 से एक राष्ट्रव्यापी अभियान के अनुसार सियासी संगठनों से संपर्क करना प्रारम्भ कर देगी, जो- पार्टी लाइन से ऊपर उठकर होगा? जल्दी ही कांग्रेस, सपा सहित विपक्षी नेताओं को विशेष रूप से पूजे गए पीले चावल दे कर आमंत्रित किया जाएगा!
खबरों की मानें तो विश्व हिंदू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल का बोलना है कि सियासी विचारधारा के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा, हर इच्छुक आदमी को, चाहे उनकी सियासी संबद्धता कुछ भी हो, पवित्र अक्षत के साथ आमंत्रित किया जाएगा।
वैसे तो सनातन धर्म में सर्वोच्च सत्ता शंकराचार्य हैं, इसलिए श्रीराम मंदिर की प्रमुख पूजा शंकराचार्य को ही करनी चाहिए, लेकिन ऐसा हो पाएगा, यह लगता नहीं है, लेकिन मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की पूजा अमर्यादित नहीं हो इसके लिए जशोदाबेन को जरूर आमंत्रित करना चाहिए।

