उत्तराखण्ड

चमोली के पास ग्लेशियर ने मचाई बताही, जानें क्यों बार-बार पैदा हो रही है ऐसी स्थिति…

चमोली के पास ग्लेशियर टूटा है चमोली क्षेत्र में पहले भी ग्लेशियर टूट चुका है, जब कोई ग्लेशियर टूटता है तो एवलांच की स्थिति बन जाती है यानि बड़े वेग से पहाड़ों से बर्फ गिरने लगती है बर्फ का सैलाब आ जाता है जहां ये ग्लेशियर टूटा वहां पास में सड़क का काम चल रहा था, जिसमें 59 मजदूर दब गए रेस्क्यू का काम चल रहा है कई श्रमिकों को निकाला जा चुका है हिमालयीय इलाकों में ग्लेशियर अक्सर क्यों टूट रहे हैं

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चार वर्ष ठीक इसी महीने में भी उत्‍तराखंड के चमोली में ग्‍लेशियर टूटने से बड़ी तबाही हुई थी तब ग्‍लेशियर टूटने से आए सैलाब ने 100 से ज्‍यादा जानें लीं थीं बहुत से लोग लापता हो गए थे

इस प्राकृतिक आपदा के घटित होने के पीछे क्‍या वजहें रही होंगी मौसम विज्ञानियों की नज़र में इस आपदा के पीछे बड़ी वजह ग्‍लोबल वॉर्मिंग है साथ ही हाल में ही उत्‍तराखंड में हुई ताजा बर्फबारी (Snowfall) भी

ग्‍लेशियर की निचली परत कमजोर होना बड़ी वजह
ग्‍लोबल वॉर्मिंग इस आपदा के पीछे बड़ी वजह रही है दरअसल जब उत्‍तराखंड में बर्फबारी होती है उसके बाद आसमान साफ होने लगता है तेज धूप निकलती है तो ग्‍लेशियर की निचली परत पर काफी वजन आ जाता है इससे ग्‍लेशियर में क्रैक आ जाते हैं निचली परत के कमजोर हो जाने और पिघलने के कारण ग्‍लेशियर के टूटने की स्थिति बन जाता है

ऐसे पानी तेज बहाव से आगे की ओर बहा!
जब ग्‍लेशियर का बड़ा हिस्‍सा पहाड़ से बहुत तेजी से गिरता है तो उसके साथ मिट्टी, पत्‍थर एवं अन्‍य तत्‍व भी वेग से नीचे गिरते हैं और तबाही लाते हैं

क्या है ग्‍लेशियर्स की रेगुलर मॉनिटरिंग का तरीका
हालांकि मौसम विभाग ग्लेशियर्स की रेगुलर मॉनिटरिंग करता है कहा जा रहा है कि इसे लेकर वार्निंग जारी हुई थी सैटेलाइट इमेजरी और रिमोट सेंसिग के जरिये लगातार ग्‍लेशियरों पर लगातार नज़र रखी जाती है, देखा जाता है कि पिछले कुछ महीनों में फलां ग्‍लेशियर कितना पिघला है या फ‍िर वह कितना बढ़ा है इनके जरिये ग्‍लेशियरों की पूरी विस्‍तृत रिपोर्ट तैयार की जाती है

हालांकि जब ग्‍लेशियरों में क्रैक आ जाते हैं तो उसमें अलवांच कब हो जाएगा, इसका पता नहीं चल पाता इसका पूर्वानुमान लगा पाना कठिन ही होता है

ग्लेशियर के टूटने की वजहें
भारत में हिमालय के करीबी ग्लेशियरों के टूटने (ग्लेशियल ब्रेक) के कई कारण हैं, जिनमें प्राकृतिक और मानव-जनित दोनों कारक शामिल हैं

1. जलवायु बदलाव और ग्लोबल वार्मिंग
वैश्विक तापमान बढ़ने से हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं
बढ़ता तापमान बर्फ के कमजोर होने और टूटने की आसार को बढ़ा देता है
इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) की रिपोर्ट के अनुसार, हिमालय में बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिससे ग्लेशियर अस्थिर हो रहे हैं

2. ग्लेशियल झीलों का बनना और अचानक फटना
जब ग्लेशियर पिघलते हैं, तो उनके आसपास झीलें बन जाती हैं.
यदि ये झीलें अत्यधिक पानी से भर जाती हैं, तो उनकी दीवारें टूट सकती हैं, जिससे विध्वंसक बाढ़ आ सकती है
उत्तराखंड (2021) और सिक्किम (2023) जैसी घटनाएं इसी कारण हुईं.

3. भूकंप और भूगर्भीय हलचल
हिमालय क्षेत्र में टेक्टोनिक प्लेटों की गतिविधि जारी रहती है
भूकंप या भूगर्भीय हलचल से ग्लेशियर की संरचना कमजोर हो सकती है, जिससे वे टूट सकते हैं

4. अनियंत्रित विकास और मानव गतिविधियां
जलविद्युत परियोजनाओं, सड़कों और सुरंगों के निर्माण से हिमालयी क्षेत्र की स्थिरता प्रभावित हो रही है
भारी निर्माण कार्य ग्लेशियरों के पास कंपन (vibrations) पैदा कर सकता है, जिससे उनका टूटना आसान हो जाता है
जंगलों की कटाई और क्षेत्र में सड़कों के निर्माण के लिए भारी मशीनरी को लाना ले जाना और उन्हें काम में लाना भी इसे बढ़ाता है पर्यावरणीय असंतुलन की स्थिति पैदा करता है

5. काले कार्बन का प्रभाव
डीजल वाहनों, फैक्ट्रियों और जंगल की आग से निकलने वाले काले कार्बन कण ग्लेशियरों पर जमा हो जाते हैं
इससे बर्फ की ऊपरी सतह गहरी हो जाती है, जिससे वह अधिक गर्मी अवशोषित करती है और तेजी से पिघलने लगती है.

6. चरम मौसम की घटनाएं
जलवायु बदलाव के कारण अत्यधिक बारिश और बर्फबारी की घटनाएं बढ़ रही हैं
भारी वर्षा से बर्फ कमजोर हो सकती है और ग्लेशियर के टूटने की आसार बढ़ जाती है

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