उत्तराखण्ड

जानें, क्यों खास है लोहाघाट में बनी लोहे की कड़ाही…

बागेश्वर: उत्तराखंड के कुमाऊं में वैसे तो कई पारंपरिक चीजें फेमस हैं इनमें से एक लोहाघाट की कड़ाही भी है जिसकी लोकप्रियता कुमाऊं के साथ-साथ पूरे उत्तराखंड में है लोहाघाट में बनी लोहे की कड़ाही शुद्धता में सबसे बेस्ट होती है इन दिनों बागेश्वर में लोहाघाट से आए व्यापारी हाथ से बनी लोहे की कड़ाही बेच रहे हैं बागेश्वर समेत अन्य जिलों के लोग लोहे की कड़ाही की खूब डिमांड कर रहे हैं

3 maintainence tips for iron kadhai

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लोहाघाट से बागेश्वर आए व्यापारी राजेश कुमार ने लोकल 18 को कहा कि लोहाघाट में लोहे की कड़ाही हाथों से बनाई जाती है इसे बनाने के लिए मशीन का यूज नहीं किया जाता है हाथ से बनी होने की वजह से हर वर्ष बागेश्वर उत्तरायणी मेले में इस लोहे की कड़ाही की अच्छी बिक्री होती है

यहां बनाई जाती है
राकेश ने बोला कि ‘लोहाघाट में लोहे की कड़ाही कमलेख धौना में बनाती है हमारा पूरा परिवार कड़ाही बनाने और बेचने का काम करता है मेले में लाई गई सभी कढ़ाईयां हाथ से बनी होती हैं हम बागेश्वर उत्तरायणी मेले में हर वर्ष आते हैं सिर्फ़ कोविड-19 के समय नहीं आए थे मेले में कड़ाही की अच्छी बिक्री होती है लोगों को इन कढ़ाईयों की शुद्धता का ज्ञान होता है इसलिए वे खुशी-खुशी लोहे की कढ़ाईयों को खरीदते हैं हम उत्तराखंड में होने वाले सभी बड़े मेलों में जाते हैं अन्य मेलों की अपेक्षा बागेश्वर में लोहे की कड़ाही की डिमांड अधिक रहती है

उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल दोनों जगहों के लोग कड़ाही को खूब पसंद करते हैं उत्तराखंड के अतिरिक्त दिल्ली, मुंबई, लखनऊ में रहने वाले पहाड़ी लोग भी इनकी खूब डिमांड करते हैं लोग लोहाघाट की कड़ाही खरीदने के लिए सालभर प्रतीक्षा करते हैं हमारी दुकान में 400 रुपये से लेकर 18,000 रुपये तक की कड़ाही है हाथ से लोहे की कड़ाही सिर्फ़ लोहाघाट में बनती है रामनगर में मशीनों से लोहे की कड़ाही बनाई जाती है जबकि लोहाघाट में लोहे की चादर को हथौड़े से पीटकर कड़ाही तैयार की जाती है

एक बार खरीद ली तो कई पुश्तों तक चलती है
उत्तरायणी मेले के दौरान बागेश्वर के लोगों ही नहीं बल्कि दूर-दूर से मेले में आएं लोग लोहे की कड़ाही को खुशी-खुशी खरीदते हैं लोहाघाट की कड़ाही बाजार में मिलने वाली कड़ाही की तुलना में अधिक मजबूत होती है इन कढ़ाईयों को मशीनों में नहीं बनाया जाता है चादर को हथौड़े से पीटकर कड़ाही का आकर दिया जाता है इन कढ़ाईयों में जंग लगने की परेशानी नहीं आती है एक बार खरीदने के बाद लोहाघाट की कड़ाही कई पुश्तों तक चलती है

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