उत्तराखण्ड

वीरान हो गए पहाड़ के चबूतरों समेत कई धरोहरें

Bageshwar: उत्तराखंड के बागेश्वर जैसे कई जिलों के गांवों की रौनक अब बदल गई है कई गांव वीरान हो गए हैं आधुनिक जीवनशैली ने लोगों को व्यस्त कर दिया है बच्चे गांव से दूर होकर शहरों में पलायन कर चुके हैं ऐसे में गांव ही नहीं गांव के चबूतरे भी वीरान हो गए हैं कभी जिन चबूतरों पर बैठकर पंचायत अहम निर्णय सुनाया करती थी आज वे सूनसान पड़े किसी के आने का प्रतीक्षा करते से दिखते हैं मीडिया से वार्ता करते हुए वरिष्ठ पत्रकार रमेश पर्वतीय बताते हैं कि लोगों को अब गांव पसंद नहीं आ रहें हैं और वह शहरों की तरफ रूख कर‌ रहे हैं जिसके चलते पहाड़ के चबूतरों समेत कई धरोहरें वीरान हो गई हैं

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चबूतरे पर होते थे अहम फैसले
पहले गांवों में किसी भी जरूरी मसले या परेशानी पर निर्णय लेने के लिए गांव के चबूतरे में पंचायतें बैठती थीं यही चबूतरे गांव की एकता और संस्कृति के प्रतीक थे इन चबूतरों पर ग्रामीण मिल-बैठकर अपने मसलों का हल निकालते थे गांव के बुजुर्ग और पंचायत के लोग यहां बैठकर गांव के हर छोटे-बड़े मामले पर फैसला करते थे यह चबूतरे समाज में एकता और सामंजस्य की भावना को बनाए रखने का माध्यम थे परंतु आज ये चबूतरे विरान और सूने हो गए हैं, जैसे किसी अपने का प्रतीक्षा कर रहे हों

बच्चों की किलकारियों का समाप्त हुआ शोर
गांव के चबूतरों पर एक समय में बच्चों की किलकारियों का शोर गूंजा करता था ये चबूतरे बच्चों के खेलने-कूदने की स्थान हुआ करते थे बच्चे यहां खेलते, हंसी-ठिठोली करते और इन चबूतरों पर बैठकर अपनी दुनिया में खो जाते थे, लेकिन अब बच्चों का बचपन भी गांव से दूर शहरों की चकाचौंध में बदल चुका है बच्चों का समय अब मोबाइल और कंप्यूटर ने ले लिया है

गांव के चबूतरे सांस्कृतिक धरोहर
गांव के चबूतरे न सिर्फ़ बैठने की स्थान थे, बल्कि यह गांव की सांस्कृतिक धरोहर के भी प्रतीक थे वरिष्ठ पत्रकार रमेश पर्वतीय के मुताबिक पलायन की वजह से पहाड़ों के चबूतरे और अन्य धरोहरें अब सूनी हो चुकी हैं यह स्थिति ऐसी ही रही, तो आने वाले समय में इन चबूतरों और सांस्कृतिक धरोहरों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है

गांव के ये चबूतरे सामाजिक एकता को बनाए रखने का एक साधन थे अब इन चबूतरों की वीरानगी एक बड़ी सामाजिक परेशानी की ओर इशारा कर रही है गांवों की इस परंपरा और सांस्कृतिक धरोहर को बचाने के लिए महत्वपूर्ण है कि लोग वापस अपने गांवों की ओर रुख करें और अपने पूर्वजों की इस धरोहर को पुनर्जीवित करें

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